मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 34
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रिय: । भिक्षाबलिपरिश्रान्तः प्रत्रजन्‌ प्रेत्य वर्धते ।।
एक आश्रम से दूसरे आश्रम में (ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थाश्रम में और गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थाश्रम में) आकर यथाशक्ति हवनकर जितेन्द्रीय रहता हुआ, भिक्षाचरण एवं बलिकर्म से श्रान्त (थका) हुआ द्विज विषयाशक्ति का त्याग करता (संन्यास लेता) हुआ मरकर ब्रह्मभूत हो अतिसिद्धि (मुक्तिरूप अतिशयित सिद्धि) को प्राप्त करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें