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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 17
अग्नरिपक्वाशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा । अश्मकुट्टो भवेद्वाऽपि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ।।
(वानप्रस्थी) अग्नि में पकाये हुए अन्नादि को खाने वाला बने, अथवा स्वनियत समय पर पकने वाले (फल आदि) पदार्थो को खाने वाला बने, अथवा अश्मकुट्ट (पत्थर से अन्नादि फोड़ या कूट-पीसकर खाने वाला) बने, अथवा दन्तोलूखलिक (सब भक्ष्य पदार्थों को दाँतों से ही चबाकर खाने वाला) बने।
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