जब (संन्यासी) विषयों में दोष की भावना से सब विषयों से निःस्पृह हो जाता है, तब इस लोक में (सन्तोषजन्य) तथा परलोक में (मोक्ष लाभ रूप) नित्य सुख को प्राप्त करता है।
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