(गृहाश्रमियों के) घरों में जब.धुँआ दिखाई न पड़ता हो, मूसल का (अन्न कूटने के लिये) शब्द न होता हो, आग बुझ गयी हो, सब लोग भोजनकर लिये हों और खाने के पात्र (मिट्टी के सकोरे, पत्तल, दोने आदि) बाहर फेंक दिये गये हो; तब भिक्षा के लिये संन्यासी प्रतिदिन निकले।
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