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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 26
अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः । शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूलनिकेतनः ।।
(वानप्रस्थाश्रमी) सुख-साधक-साधनों में उद्योग छोड़कर ब्रह्मचारी, भूमि पर सोने वाला, निवास स्थान में ममत्वरहित हो पेड़ों के मूल (पेड़ों के नीचे का स्थान) को घर समझकर निवास करे।
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