जिस किसी भी आश्रम में रत रहता हुआ (उसके कुछ विरुद्ध आचरण करने से) दोषयुक्त होता हुआ भी सब जीवों में (ब्रह्मबुद्धि रखने के कारण) समान दृष्टि होकर धर्म का आचरण करे; क्योंकि (कोई) चिह्न-विशेष धर्म का कारण नहीं होता है।
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