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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 38
प्राजापत्यां निरुप्येष्टिं सार्ववेदसदक्षिणाम्‌ । आत्मन्यग्नीन्त्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद्गृहात्‌ ।।
जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में दे देते हें ऐसे प्राजापत्य (प्रजापति जिसके देव हें ऐसा) यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोप कर ब्राह्मण घर से (निकलकर) संन्यास आश्रम को ग्रहण करे।
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