अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्ण मूत्रपुरीषयोः ।।
(उक्त दो श्लोकों से क्रमश: ब्रह्मदर्शन तथा उसके सहकारी कर्म को मोक्ष का साधन बतलाकर अब मोक्ष के अन्तरङ्गभूत यत्न और संसार से वैराग्य के लिए देह स्वरूप को अग्रिम दो श्लोकों से कहते हैं-) हड्डी रूप खम्भों वाला, स्नायु (रूप रस्सी) से युक्त, मांस और रक्तरूपी लेप (चूने से लिपना) वाला, चमड़े से ढका हुआ (पर्दे से युक्त), मल-मूत्र से भरा हुआ,
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