एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् ।
सिद्धमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ।।
अकेले (दूसरे के संगरहित संन्यासी) की सिद्धि को देखता हुआ द्विज दूसरे किसी का साथ न करके अकेला ही मोक्ष के लिए चले (घर से निकले) इस प्रकार वह किसी को नहीं छोड़ता है और न उसे कोई छोड़ता है।
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