नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा ।
तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छादग्राहाद्विमुच्यते ।।
जिस प्रकार पेड़ नदी के किनारे को छोड़ता (नदी वेग से अपने पतन को नहीं जानता हुआ गिर जाता) है; और उस पेड़ को स्वेच्छा से जैसे पक्षी छोड़ देता हे, उसी प्रकार इस शरीर को छोड़ता हुआ (संन्यासी) कष्टकारक ग्रह (पुन: शरीरधारण) से छूट जाता है।
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