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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 64
अधर्मप्रभवं चैव दुःखयोगं शरीरिणाम्‌ । धमार्थप्रभवं चैव सुखसंयोगमक्षयम्‌ ।।
शरीरधारियों (जीवों) के अधर्म से उत्पन्न (दु:ख-सम्बन्ध को धर्मकारणक ब्रह्मप्राप्ति रूप प्रयोजन से अक्षय सुख के सम्बन्ध का चिन्तन करे)।
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