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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 94
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन्‌ । नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत्‌ ।।
सब कर्म (गृहस्थ के) करने योग्य अग्निहोत्र यज्ञ आदि का त्याग कर कर्मजन्य दोष (अज्ञातावस्था में की हुई जीवहिंसा आदि) प्राणायाम (६।६९) से नष्ट करता हुआ जितेन्द्रिय होकर ग्रन्थ तथा अर्थ से वेदों का अभ्यास कर पुत्र के ऐश्वर्य में रहे। (पुत्र के द्वारा प्राप्त भोजन वस्त्र का उपभोग करता हुआ रहे) । यह 'कुटीचर' संन्यासी का लक्षण है।
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