सब कर्म (गृहस्थ के) करने योग्य अग्निहोत्र यज्ञ आदि का त्याग कर कर्मजन्य दोष (अज्ञातावस्था में की हुई जीवहिंसा आदि) प्राणायाम (६।६९) से नष्ट करता हुआ जितेन्द्रिय होकर ग्रन्थ तथा अर्थ से वेदों का अभ्यास कर पुत्र के ऐश्वर्य में रहे। (पुत्र के द्वारा प्राप्त भोजन वस्त्र का उपभोग करता हुआ रहे) । यह 'कुटीचर' संन्यासी का लक्षण है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।