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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 49
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः । आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ।।
ब्रह्म के ध्यान में लीन, (स्वस्तिक, पद्म आदि) योगासनों में बैठा हुआ अपेक्षा (कमण्डलु, दण्ड, वस्त्र आदि की सुन्दरता, नवीनता या अधिकता आदि को चाहना) से रहित, मांस (विषयों के भोग का स्वादरूप मांस) की अभिलाषा से रहित और शरीर मात्र सहायक से युक्त (बिलकुल अकेला) मोक्ष सुख को चाहने वाला (संन्यासी) इस संसार में विचरण करे।
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