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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 41
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः । समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत्‌ ।।
पवित्र कमण्डलु, दण्ड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित (किसी के द्वारा लाये गये) इच्छा-प्रवर्तक वस्तु (स्वादिष्ट, भोज्य एवं मृदु वस्त्रादि) में निःस्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे।
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