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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 43
अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्‌ । उपेक्षकोऽ सांचयिको मुनिर्भावसमाहितः ।।
लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबन्ध न करने वाला, स्थिर बुद्धि वाला, ब्रह्म का मनन करने वाला और ब्रह्म में ही भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे।
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