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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 95
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽ स्पृहः । संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम्‌ ।।
इस प्रकार सब कर्मो (गृहस्थ के त्याग अग्निहोत्रादि) का त्यागकर अपने (ब्रह्मसाक्षात्कार रूप) कार्य को प्रधान मानता हुआ (स्वर्ग आदि में भी) निस्पृह होकर संन्यास के द्वारा पापों को नष्ट कर (द्विज) परमगति (मोक्ष) को पाता है।
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