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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 48
क्रुद्ध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत्‌ । सप्तद्वारावकीर्णा च न वाचमनृतां वदेत्‌ ।।
क्रोध से युक्त भी किसी के ऊपर स्वयं क्रोध न करे। किसी के अपनी निन्दा करने पर भी उससे मधुर (निन्दा रहित) बात कहे और सप्त द्वारो से निर्गत विनाश शील (व्यर्थ) वाणी न बोले।
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