अपनी तपस्या को बढ़ाता हुआ (वानप्रस्थी यदि) ग्रीष्म ऋतु में पञ्चाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे (छाये हुए मकान का आश्रय या छाया आदि को पानी बरसते रहने पर भी न ले) और शीत (हेमन्त) ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे।
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