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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 10
दर्शेष्ट्याप्रयणं' चैव चातुर्मस्यानि चाहरेत्‌ । तुरायणं च क्रमशो दाक्षस्यायनमेव च ।।
नक्षत्रयाग, आग्रहायण (नव-सस्य) याग, चातुर्मास्य याग, उत्तरायण याग और दक्षिणायन याग को श्रौतस्मार्त विधि से क्रमशः करे।
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