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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 35
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्‌ । अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ।।
तीन ऋणों (देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण) को पूरा करके ही मन को मोक्ष में लगाये (संन्यास ग्रहण करे), उन तीन ऋणों को पूरा किये बिना (उनसे बिना छुटकारा पाये) मोक्ष का सेवन (संन्यास का ग्रहण) करने वाला नरक को जाता है।
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