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अध्याय 54 — अथ दकार्गलाध्यायः
बृहत्संहिता
125 श्लोक • केवल अनुवाद
वास्तुविद्या का वर्णन करने के पश्चात् अब जिसका ज्ञान होने पर भूमिगत जल का ज्ञान प्राप्त होता है, उस धर्म और यश को देने वाले 'दकार्गल' को कहते हैं। जिस तरह मनुष्यों के अङ्ग में नाड़ियाँ होती हैं, उसी तरह भूमि में भी ऊँची-नीची शिरायें होती हैं। आकाश से केवल एक स्वाद वाला जल पृथ्वी पर गिरता है
किन्तु वही जल पृथ्वी की विशेषता से तत्तत् स्थानों में अनेक प्रकार के रस और स्वाद वाला हो जाता है। इस तरह भूमि के वर्ण और रस के समान ही जल के भी रस और वर्ण सिद्ध होते हैं; अतः भूमि, वर्ण और रस का परीक्षण-पूर्वक जल के रस और स्वाद का परीक्षण करना चाहिये।
पूर्व आदि आठ दिशाओं के क्रम से इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, वायु, चन्द्र और शिव स्वामी होते हैं। इन आठ दिक्पतियों के नाम से आठ (ऐन्द्री, आग्नेयी, याम्या इत्यादि) ही शिरायें प्रसिद्ध हैं।
इन आठ शिराओं के मध्य में महाशिरा नाम वाली नवमी शिरा है। इन नव शिराओं के अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों शिरायें निकली हैं, जो अपने-अपने नाम से प्रसिद्ध है।
पाताल से कऊपर की तरफ जो शिरा निकली है, वह और पूर्व आदि चारों दिशाओं में स्थित शिरायें शुभ तथा अग्निकोण आदि विदिशाओं में स्थित शिरायें अशुभ होती हैं। अतः इसके बाद शिराओं के लक्षण कहते हैं।
यदि जलरहित देश में वेदमजनूँ का वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा में डेढ़ पुरुष नीचे जल कहना चाहिये। भुजा ऊपर की तरफ खड़ी करने से पुरुष, की जितनी लम्बाई हो, वह एक पुरुषप्रमाण (१२० अंगुल) यहाँ पर ग्रहण करना चाहिये।
इस खात में पश्चिमा शिरा बहती है। यहाँ पर खोदने के समय कुछ चिह्न निकलते हैं, जैसे- आधा पुरुषप्रमाणतुल्य खोदने पर पाण्डु वर्ण का मेड़क, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे पत्थर और पत्थर के नीचे जल मिलता है।
यदि जलरहित देश में जामुन का वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ उत्तर दिशा में दो पुरुषतुल्य नीचे पूर्व शिरा होती है। वहाँ पर भी खोदने के समय में कुछ चिह्न निकलते हैं; जैसे-एक पुरुषप्रमाणतुल्य नीचे लोहे के समान गन्ध वाली मिट्टी, उसके नीचे कुछ सफेद मिट्टी और उसके नीचे मेढ़क निकलता है।
जामुन के वृक्ष से पूर्व की तरफ समीप में ही बाँबी हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण दिशा में दो पुरुष नीचे मधुर जल मिलता है।
आधा पुरुषप्रमाण नीचे मछली और उसके नीचे कबूतर के समान रंग वाला पत्थर निकलता है तथा इस खात में नील वर्ण को मिट्टी होती है और चिर काल तक अधिक जल होता है।
जलरहित देश में गूलर का वृत हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा में ढाई पुरुष नीचे सुन्दर जल वाली शिरा होती है। यहाँ पर भी खोदने के समय कुछ चिह्न मिलते हैं; जैसे-आधा पुरुष खोदने पर सफेद सर्प, उसके नीचे काला पत्थर और उसके नीचे सुन्दर जल वाली शिरा निकलती है।
अर्जुन वृक्ष से तीन हाथ उत्तर दिशा में बाँबी हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिसा में साढ़े तीन पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर भी खोदने पर कुछ चिह्न मिलते हैं
जैसे-आधा पुरुष नीचे गोधा (गोह), एक पुरुषतुल्य नीचे काली-सफेद मिट्टी, उसके नीचे काली मिट्टी, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे सफेद रेत और उसके नीचे अधिक जल निकलता है।
वल्मीकयुक्त निर्गुण्डी (सिन्दुवार वृक्ष 'सिन्दुवारेन्द्रसुरसौ निर्गुण्डीन्द्राणिकेत्यपी'- त्यमरः ) हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण दिशा में सवा दो पुरुष नीचे कभी नहीं सूखने वाला जल होता है। यहाँ पर खोदने के समय वक्ष्यमाण चिह्न मिलते हैं-
आधा पुरुष नीचे लाल मछली, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे सफेद मिट्टी, उसके नीचे पत्थर के सूक्ष्म कणों से समन्वित रेत और उसके नीचे जल की प्राप्ति होती है।
यदि वेर के वृक्ष से पूर्व दिशा में वल्मीक हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा में तीन पुरुष नीचे जल कहना चाहिये। यहाँ पर आधा पुरुष नीचे सफेद छिपकिली निकलती है।
जलरहित देश में पलाश (ढाक) के वृक्ष से युक्त वेर का वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा में सवा तीन पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुष नीचे विषरहित सर्प मिलता है।
जहाँ वेल के वृक्ष से युक्त गूलर का वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण दिशा में तीन पुरुष नीचे जल की स्थिति होती है। यहाँ पर आधा पुरुष नीचे कृष्ण वर्ण का मेढ़क निकलता है।
यदि काकोदुम्बरिका वृक्ष (कटुम्बरि 'काकोदुम्बरिका फल्गुर्मलपूर्जयने फले'- त्यमरः) के समीप वल्मीक हो तो उस वल्मीक के सवा तीन पुरुष नीचे पश्चिम दिशा में बहने वाली शिरा निकलती है।
यहाँ पर खोदने के समय सफेद और पीली मिट्टी निकलती है। उसके नीचे सफेद पत्थर और आधा पुरुष नीचे सफेद चूहा दिखाई देता है।
जलरहित देश में कम्पित्त वृक्ष (कपिल कवीला) दिखाई दे तो उससे तीन हाय पूर्व दिशा में सवा तीन पुरुष नीचे दक्षिण शिरा बहती है। यहाँ पर खोदने के समय पहले नील कमल के समान रंग
वाली मिट्टी और उसके नीचे कबूतर के रंग की मिट्टी दिखाई देती है तथा एक हाथ नीचे बकरे के समान गन्ध वाली मछली और उसके नीचे खारा जल निकलता है।
जलरहित देश में शोणाक (सरिवन) वृक्ष दिखाई दे तो उससे दो हाथ वायव्य कोण में तीन पुरुष नीचे 'कुमुदा' नाम की शिरा होती है।
यदि विभीतक (बहेड़ा) वृक्ष के समीप दक्षिण दिशा में वल्मीक दिखाई दे तो उस वृक्ष से दो हाथ पूर्व डेढ़ पुरुष नीचे शिरा होती है।
यदि बहेड़े के वृक्ष से पश्चिम दिशा में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से उत्तर दिशा में साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा होती है। यहाँ पर खोदने के समय एक पुरुष नीचे श्वेत रंग का विश्वम्भरक (प्राणिविशेष) दिखाई देता है।
उसके नीचे केशर के रंग का पत्थर और उसके नीचे पश्चिम दिशा को बहने वाली शिरा निकलती है; परन्तु यह शिरा तीन वर्ष बाद नष्ट हो जाती है अर्थात् जल नष्ट हो जाता है।
जहाँ पर कोविदारक ( छितिवन सप्तपर्ण) वृक्ष के ईशान कोण में कुशायुक्त श्वेत वल्मीक हो, वहाँ पर सप्तपर्ण वृक्ष और वल्मीक के मध्य में साढ़े पाँच पुरुष नीचे अधिक जल होता है।
यहाँ पर खोदने के समय एक पुरुष नीचे कमलपुष्प के मध्य के समान रंग का सर्प, उसके नीचे लाल वर्ण को भूमि और उसके नीचे कुरुविन्द नामक पत्थर निकलता है। ये सभी चिह्न यहाँ पर कहने चाहिये।
यदि वल्मीक से युक्त सप्तपर्ण वृक्ष हो तो उससे एक हाथ उत्तर पाँच पुरुष नीचे जल कहना चाहिये। जहाँ पर भी वक्ष्यमाण चिह्न मिलते हैं
आधा पुरुष नीचे हरा मेढ़क, उसके बाद हरईल के समान पीली भूमि, उसके नीचे मेघ के समान काला पत्थर और उसके नीचे मधुर जल वाली उत्तरवाहिनी शिरा निकलती है।
जिस-किसी वृक्ष के मूल में मेढ़क दिखाई दे, उस वृक्ष से एक हाथ आगे उत्तर दिशा में साढ़े चार पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर खोदने के समय
एक पुरुष नीचे नेवला, उसके नीचे क्रम से नीली, पीली तथा सफेद मिट्टी, उसके नीचे मेढक के सदृश पत्थर और उसके नीचे जल निकलता है।
यदि करञ्जक वृक्ष के दक्षिण दिशा में वल्मीक दिखाई दे तो उस वृक्ष से दो हाथ दक्षिण तीन पुरुष नीचे शिरा होती है।
यहाँ पर आधा पुरुष नीचे कछुआ, उसके नीचे पूर्ववाहिनी शिरा, उसके नीचे उत्तरवाहिनी शिरा, उसके नीचे हरे रंग का पत्थर और उसके नीचे जल निकलता है।
महुए के वृक्ष से उत्तर वल्मीक हो तो उस वृक्ष से पाँच हाथ आगे पश्चिम दिशा में साढ़े आठ पुरुष नीचे जल होता है।
यहाँ पर एक पुरुष नीचे प्रधान सर्प, उसके नीचे धूम्र वर्ण की पृथ्वी, उसके नीचे कुल्थी के रंग का पत्थर और उसके नीचे सदा फेनयुत जल देने वाली पूर्ववाहिनी शिरा निकलती है।
तिलक ( तालमखाना) के वृक्ष से दक्षिण कुशा और दूब से युक्त स्निग्ध वल्मीक हो तो उस वृक्ष से पाँच हाथ पश्चिम में पाँच पुरुष नीचे जल और पूर्ववाहिनी शिरा होती है।
कदम्ब वृक्ष से पश्चिम में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से तीन हाथ दक्षिण में पौने छः पुरुष नीचे जल होता है।
वहाँ लोहे के गन्य से युक्त अधिक जल वाली उत्तरवाहिनी शिरा निकलती है। एक पुरुष नीचे सुवर्ण के रंग का मेड़क और उसके नीचे पीली मिट्टी निकलती है।
यदि वल्मीक से युक्त ताड़ (ताल) या नारियल का वृक्ष हो तो उस वृक्ष से छः हाथ पश्चिम दिशा में चार पुरुष नीचे दक्षिणवाहिनी शिरा होती है।
कपित्थ (कैच) के वृक्ष से दक्षिण में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से सात हाथ उत्तर दिशा में पाँच पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुषतुल्य नीचे चितकबरा सर्प और काली मिट्टी होती है।
उसके नीचे परतदार पत्थर, उसके नीचे सफेद मिट्टी तथा एक पश्चिमवाहिनी शिरा और उसके नीचे उत्तरवाहिनी शिरा होती है।
अश्मन्तक वृक्ष के बाँयीं तरफ बेर का वृक्ष या वल्मीक हो तो उस वृक्ष से छः हाथ आगे उत्तर दिशा में साढ़े तीन पुरुष नीचे जल होता है।
यहाँ पर एक पुरुष नीचे कछुआ, उसके नीचे घूसर वर्ण का पत्थर, उसके नीचे रेतीली मिट्टी, उसके नीचे दक्षिण शिरा और उसके नीचे ईशान कोण की शिरा निकलती है।
हरिद्र ( हरदुआ) वृक्ष की बाँयों तरफ वल्मीक हो तो उस वृक्ष से तीन हाथ पूर्व दिशा में एक तिहाई युत पाँच पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुष नीचे नील वर्ण का सर्प
नील वर्ण का सर्प, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे हरे रंग का पत्थर, उसके नीचे काली भूमि एवं उसके नीचे पश्चिमशिरा और दक्षिणशिरा निकलती है।
जिस जलरहित देश में बहुत जल वाले देश के चिह्न दिखाई दें तथा जहाँ पर वीरण (गाँडर) और दूब अधिक कोमल हों, वहाँ एक पुरुष
नीचे जल होता है तथा जहाँ पर भङ्गरैया, निसोत, इन्द्रदन्ती (दन्तिया जयपाल), सूकरपादी, लक्ष्मणा- ये औषधियाँ हों, वहाँ से दो हाथ आगे दक्षिण दिशा में तीन पुरुष नीचे जल की प्राप्ति होती है।
जहाँ निर्मल लम्बी डालियों से युत छोटे-छोटे विस्तृत वृक्ष हों, वहाँ जल निकट में होता है और जहाँ अन्तःसार वाले, विवर्ण पत्ते वाले, रूखे वृक्ष हों, वहाँ जलाभाव होता है।
जहाँ पर निर्मल वल्मीक से युत तिलक, आम्रातक (अम्बाड़ा), वरुणक (बरण), भिलावा, बेल, तेन्दु (तेन्दुआ)
अङ्कोल, पिण्डार, शिरीष, अञ्जन, परूषक (फालसा), अशोक, अतिवला-ये वृक्ष हों, वहाँ इन वृक्षों से तीन हाथ आगे उत्तर दिशा में साढ़े चार पुरुष नीचे जल होता है।
तृणरहित प्रदेश में कोई एक स्थान तृणयुत दिखाई दे अथवा तृणयुत प्रदेश में कोई एक स्थान तृणरहित दिखाई दे तो उस स्थान पर साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा अथवा धन होता है।
जहाँ काँटे वाले वृक्षों में एक विना काँटे वाला अथवा विना काँटे वाले वृक्षों में एक काँटे वाला वृक्ष हो, वहाँ उस वृक्ष से तीन हाथ आगे पश्चिम दिशा में एक तिहाई युत तीन पुरुष नीचे जल या धन होता है।
जहाँ पाँव से ताड़न करने पर गम्भीर शब्द हो, वहाँ तीन पुरुष नीले जल और उत्तर शिरा होती है।
वृक्ष की एक शाखा नीचे की ओर झुकी हो या पीली पड़ गई हो तो उस शाखा के नीचे तीन पुरुषसमान खोदने पर जल मिलता है।
जिस वृक्ष के फल-पुष्पों में विकार उत्पन्न हो, उस वृक्ष से तीन हाथ पर पूर्व दिशा में चार पुरुष नीचे शिरा होती है तथा नीचे पत्थर और पीली भूमि मिलती है।
जहाँ काटों से रहित और सफेद पुष्पों से युत कटेरी का वृक्ष दिखाई दे, उस वृक्ष के नीचे साढ़े तीन पुरुष खोदने पर जल निकलता है।
जिस जलरहित देश में दो शिर वाले खजूर का पेड़ हो, वहाँ उस वृक्ष से दो हाथ पश्चिम दिशा में तीन पुरुष नीचे जल कहना चाहिये ।
यदि सफेद पुष्प वाला कर्णिकार (कठचम्पा) या ढाक का वृक्ष हो तो उस वृक्ष से दो हाथ दक्षिण दिशा में दो पुरुष नीचे जल होता है।
जिस स्थान से भाप या घूंआ निकलता हुआ दिखाई दे, वहाँ दो पुरुष नीचे बहुत जल बहने वाली शिरा कहनी चाहिये।
जिस खेत में धान्य उत्पन्न होकर नष्ट हो जाय, बहुत निर्मल धान्य हो या उत्पन्न होकर पीला पड़ जाय, वहाँ दो पुरुष नीचे बहुत जल बहने वाली शिरा होती है।
अब मरु देश में जिस प्रकार की शिरा होती है, उसको कहते हैं। जैसे-ऊँट की गर्दन की तरह भूमि में ऊँची-नीची शिरा होती है।
यदि पीलु ( पिलुआ = 'पीलौ गुडफलः संसी'त्यमरः) वृक्ष के ईशान कोण में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से साढ़े चार हाथ पश्चिम दिशा में पाँच पुरुष नीचे उत्तर बहने वाली शिरा होती है।
यहाँ खोदने के समय एक पुरुष नीचे मेढ़क, उसके नीचे पीली तथा हरी मिट्टी, उसके नीचे पत्थर और उसके नीचे जल कहना चाहिये।
पीलु वृक्ष की पूर्व दिशा में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से साढ़े चार हाथ दक्षिण दिशा में सात पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
यहाँ खोदने पर एक पुरुषप्रमाण नीचे एक हाथ लम्बा चितकबरा सर्प और उसके नीचे बहुत खारा जल बहने वाली दक्षिण शिरा निकलती है।
करीर ( करील) वृक्ष के उत्तर दिशा में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से साढ़े चार हाथ पर दक्षिण दिशा में दस पुरुष नीचे मधुर जल जानना चाहिये। यहाँ पर एक पुरुष नीचे पीला मेढ़क दिखाई देता है।
रोहीतक (लाल करञ्ज) वृक्ष के पश्चिम में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से तीन हाथ आगे दक्षिण दिशा में बारह पुरुषप्रमाण नीचे खारे जल वाली पश्चिमवाहिनी शिरा निकलती है ।
यदि अर्जुन वृक्ष के पूर्व में वल्मीक दिखाई दे तो उस वृक्ष से एक हाथ पर पश्चिम दिशा में चौदह पुरुषप्रमाण नीचे शिरा निकलती है और एक पुरुषप्रमाण नीचे पीला गोह दिखाई देता है।
धत्तूर वृक्ष के उत्तर वल्मीक हो तो उस वृक्ष से दो हाथ दक्षिण पन्द्रह पुरुष नीचे जल होता है। इस खात में खारा जल होता है
तथा आधा पुरुष नीचे नेवला, ताम्रवर्ण का पत्थर और लाल रंग की मिट्टी निकलती है। यहाँ दक्षिण शिरा बहती है।
वल्मीक विना भी बेर एवं लाल करञ्ज- ये दोनों वृक्ष इकट्ठे दिखाई दें तो उन वृक्षों से तीन हाथ आगे पश्चिम दिशा में सोलह पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। यहाँ पर मधुर जल होता है।
यहाँ पर मधुर जल होता है। पहले दक्षिण शिरा और बाद में उत्तर शिरा बहती है, आटे के समान सफेद पत्थर तथा सफेद मिट्टी निकलती है और आधा पुरुषप्रमाण नीचे बिच्छू दिखाई देता है।
करीर वृक्ष के साथ बेर का वृक्ष दिखाई दे तो उन वृक्षों से तीन हाथ आगे पश्चिम दिशा में अट्ठारह पुरुषप्रमाण नीचे ईशान कोण में बहने वाली और बहुत जल वाली शिरा होती है।
यदि पीलु वृक्ष से युत बेर का वृक्ष हो तो उनसे तीन हाथ आगे पूर्व दिशा में बीस पुरुषप्रमाण नीचे कभी न सूखने वाला खारा जल होता है।
जिस जगह अर्जुन और करीर या अर्जुन और बेल के वृक्ष का संयोग हो तो उन वृक्षों से दो हाथ पर पश्चिम दिशा में पच्चीस पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है।
यदि वल्मीक के ऊपर दूब या सफेद कुशा हो तो वल्मीक के नीचे कूप खोदने से इक्कीस पुरुषप्रमाण नीचे जल मिलता है।
जिस भूमि में कदम्ब और वल्मीक के ऊपर दूब दिखाई दे, वहाँ कदम्ब वृक्ष से दक्षिण में दो हाथ पर पच्चीस पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है।
तीन वल्मीक के मध्य में विजातीय तीन तरह के वृक्षों से युत लाल करन का वृक्ष हो तो उस लाल करन के वृक्ष से उत्तर चार
हाथ एवं सोलह अङ्गुल पर चालीस पुरुषप्रमाण नीचे खोदने से पत्थर और उसके नीचे शिरा होती है।
जहाँ पर अनेक गाँठों से युत शमी वृक्ष हो और उसके उत्तर वल्मीक हो तो उस शमी वृक्ष के पश्चिम पाँच हाथ पर पत्चास पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है।
एक स्थान पर पाँच वल्मीक हों और उनमें बीच का वल्मीक सफेद हो तो उस सफेद वल्मीक में खोदने पर पचपन पुरुषप्रमाण नीचे शिरा निकलती है।
जहाँ पर पलाश (ढाक) के वृक्ष से युत शमी वृक्ष हो, वहाँ उन वृक्षों से पश्चिम में पाँच हाथ पर साठ पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। यहाँ पर आधा पुरुषप्रमाण नीचे सर्प और उसके नीचे रेत मिली हुई पीली मिट्टी मिलती है।
जहाँ वल्मीक से घिरा हुआ सफेद रोहीतक का वृक्ष हो, वहाँ उस वृक्ष से पूर्व दिशा में एक हाथ पर सत्तर पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है।
जहाँ सफेद काँटों से युत शमी वृक्ष हो, वहाँ उस वृक्ष से दक्षिण हाथ पर पचहत्तर पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। यहाँ पर खुदाई करने पर आधा पुरुषप्रमाण नीचे सर्व निकलता है।
जिन चिह्नों से मरुस्थल में जल-ज्ञान कहा गया है, उन चिह्नों से जाङ्गल ( स्वल्प जल वाले) देश में जल-ज्ञान नहीं कहना चाहिये। पहले जामुन, बेंत आदि के द्वारा जल-ज्ञान के समय जो पुरुष-प्रमाण कहा गया है, उसको द्विगुणित करके मरु देश में ग्रहण करना चाहिये।
यदि वल्मीक के ऊपर जामुन, निसोत, मौर्वी, शिशुमारी, सारिवा, शिवा (शमी), श्यामा, वाराही, ज्यौतिष्मती (मालकाकणी), गरुडवेगा,
सूकरिका, माषपर्णी (मूड़), व्याघ्रपदा-ये औषधियों हों तो वल्मीक से उत्तर की ओर तीन हाथ पर तीन पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है ।
पूर्वकचित तीन पुरुषप्रमाण अनूप (जलप्राय) देश के लिये है। स्वल्प जल वाले देश में इन्हीं पूर्वोक्त लक्षणों से पाँच पुरुषप्रमाण नीचे और मरु देश में सात पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
जहाँ तृण, वृक्ष, वल्मीक और गुल्मों से रहित एक वर्ष की भूमि हो तथा उस भूमि में कहीं एक जगह विकार दिखाई दे तो उस विकारयुत भूमि के पाँच पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
जहाँ स्निग्ध, नीची, रेतदार और पाँव के रखने से शब्दयुत भूमि हो, वहाँ साढ़े चार या पाँच पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
जहाँ स्निग्ध वृक्ष हों, वहाँ उन वृक्षों से चार पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है तथा जहाँ बहुत वृक्षों के मध्य में एक वृक्ष विकारयुत दिखाई दे तो वहाँ उस विकारयुत वृक्ष से दक्षिण चार पुरुषप्रमाण नीचे हरल होता है।
जिस बहुत जल वाले या स्वल्प जल वाले देश में पाँव रखने से धरती दब जाय और जहाँ विना रहने के स्थान के बहुत-से कीड़े हों, वहाँ डेढ़ पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
जहाँ सब जगह गरम और एक जगह ठण्डी या सब जगह ठण्ड़ी और एक जगह गरम भूमि हो, वहाँ साढ़े तीन पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। जिस स्वल्प जल वाले या अधिक जल वाले प्रदेश में इन्द्रधनुष, मछली या वल्मीक हो, उस भूमि में चार हाथ नीचे जल होता है।
जहाँ बहुत वल्मीकों में एक वल्मीक सबसे ऊँचा हो, वहाँ उस ऊँचे वल्मीक के नीचे चार पुरुषप्रमाण खोदने पर जल मिलता है अथवा जिस खेत में धान्य जम कर सूख जाय या जमे ही नहीं, वहाँ चार पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
जहाँ बढ़, पीपल, गूलर-ये तीनों वृक्ष इकट्ठे हों तथा जहाँ बड़, पीपल-ये दोनों वृक्ष एक साथ अवस्थित हों, वहाँ इन वृक्षों के नीचे तीन हाथ खोदने पर जल और उत्तर शिरा मिलती है।
यदि गाँव या नगर के आग्नेय कोण में कूप हो तो उस गाँव या नगर में नित्य अनेक प्रकार का भय होता है। अधिकतर आग लगती है और मनुष्य भी जल कर मरते हैं।
नैऋत्य कोण में कूप हो तो बालकों का क्षय और वायव्य कोण में हो तो त्रियों को भय होता है। शेष पाँच दिशाओं में कूप का होना शुभ होता है।
सारस्वत मुनि द्वारा जो उदकार्गल कहे गये हैं, उनको देखकर मैंने आर्या छन्दों के द्वारा यह उदकार्गल कहा है। अब मनु द्वारा प्रतिपादित उदकार्गल को वृत्तों के द्वारा कहता हूँ।
जहाँ पर स्निग्ध, छिद्ररहित पत्तों से युत वृक्ष, गुल्म या लता हो; वहाँ तीन पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। अथवा स्थलकमल, गोखरू, उशीर (खस), कुल- ये द्रव्यविशेषः गुण्ड्र (सरकण्डा, शर), काश, कुशा, नलिका, नल-ये तृणविशेष
खजूर, जामुन, अर्जुन, वेंत-ये वृक्षविशेषः दूध वाले वृक्ष, गुल्म और लता, छत्री, हस्तीकर्णी, नागकेशर, कमल, कदम्ब, करा- ये सभी सिन्दुवार वृक्ष के साथ; बहेड़ा वृक्षविशेष, मदयन्तिका द्रव्यविशेष-
ये सब जहाँ पर अवस्थित हों; वहाँ पर तीन पुरुष- प्रमाण नीचे जल होता है। साथ ही जहाँ पर एक पर्वत के ऊपर दूसरा पर्वत हो, वहाँ पर भी तीन पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है।
मूझ, काश और कुश से युत भूमि में, पत्थर की कणाओं से मिली हुई नीली मिट्टी बाली भूमि में और काली या लाल मिट्टी वाली भूमि में प्रचुर मात्रा में तथा मधुर जल होता है।
पत्थर के कणों से मिली हुई ताम्र वर्ण की भूमि में कसैला, पीली भूमि में खारा, पाण्डु रङ्ग की भूमि में नमकीन और नीली भूमि में मीठा जल होता है।
जहाँ पर छिद्र वाले पत्तों से युत शाक (तरकारी सब्जी), अश्वकर्ण (संखुआ), अर्जुन, बेल, सर्ज, श्रौपर्णी, अरिष्ट, धव, शीशम-ये वृक्ष हों तथा जहाँ पर छिद्र वाले एनों में यत व गल्म लता हो: वहाँ बहत दर पर जल होता है।
जहाँ सूर्य, अग्नि, भस्म, ऊँट या गदहे के रंग की या लाल रंग की भूमि में लाल अंकुर वाला, दूध वाला करीर वृक्ष हो या लाल वर्ण की भूमि हो, वहाँ पत्थर के नीचे जल होता है।
वैदूर्य मणि, मूंग या मेघ के समान काला, पकने वाले गूलर के फल के समान, फोड़ने से अञ्जन के समान काला या पछि पत्थर जहाँ हो, वहाँ पर समीप में ही बहुत जल होता है।
कबूतर, शहद, घृत या सोमलता के समान रंग वाला पत्थर जहाँ पर हो, वहाँ भी कभी नहीं नष्ट होने वाला जल शीघ्र निकलता है।
ताम्र वर्ष के बिन्दुओं से युत, विचित्र बिन्दुओं से युत, पाण्डु वर्ण वाला, भस्म, ऊँट या गदहे के समान वर्ण वाला, अङ्गुष्ठिका वृक्ष के समान नीला, सूर्य या अग्नि के समान वर्ण वाला पत्थर जहाँ पर हो, वहाँ पर जल नहीं होता है।
चन्द्रकिरण, स्फटिक, मोती, सोना, इन्द्रनील मणि, सिंगरफ, अञ्जन, उदयकालिक सूर्यकिरण और हरिताल के समान रंग वाला पत्थर शुभ होता है। अब यहाँ इसके बाद ये वक्ष्यमाण वृत्तान्त मुनिकथित हैं।
पूर्वकथित समस्त शुभ शिलायें कल्याण करने वाली होती हैं एवं वे सदा ही यक्षों और नागों से सेवित रहती हैं। जिनके राज्य में ये शिलायें होती हैं, उनके यहाँ कभी भी अवृष्टि नहीं होती।
यदि कूप आदि खोदने के समय पत्थर निकल जाय और वह आसानी से न फूट सके तो उसके ऊपर ढाक और तेन्दु की लकड़ी जला कर आग के समान लाल बना कर उसके ऊपर चूने की कली से मिश्रित जल का छिड़काव करने से वह शिला फूट जाती है।
मोक्षक (काली पाढरि) वृक्ष की लकड़ी का भस्म मिलाकर जल को गर्म करे और फिर उसमें शर के वृक्ष का भस्म मिलावे; बाद में अग्नि से तपाई हुई शिला पर उसे सात बार छिड़कने से शिला फूट जाती है।
छाउ, काँजी, मद्य, कुलथी- इन सबको मिलाकर एक बरतन में सात रात तक छोड़ दे, बाद में अग्नि से तपाई हुई शिला पर उसे बार-बार छिड़कने से शिला फूट जाती है।
छाछ, काँजी, मद्य, कुलथी- इन सबको मिलाकर एक बरतन में सात रात तक छोड़ दे, बाद में अग्नि से तपाई हुई शिला पर उसे बार-बार छिड़कने से शिला फूट जाती है।
नीम के पत्ते, नीम की छाल, तिलों का नाल, अपामार्ग, तेन्दू का फल, गिलोय- इन सबों के भस्म को गोमूत्र में मिलाकर उसे तपाई हुई शिला पर छः बार छिड़कने से शिला फूट जाती है।
शस्त्र पर पहले तिल का तेल मले, फिर मेष के सींग का भस्म तथा कबूतर और चूहे की बीट से युत आक के वृक्ष के दूध का लेप करे, फिर उसको आग में तपा कर पूर्वोक्त पान देवे। ऐसा करने के पश्चात् तेज करके पत्थर पर प्रहार करने से भी उसकी घार नहीं टूटती है।
एक अहोरात्र तक तक्र से युत कदली वृक्ष की भस्म में स्थापित लोहे में पूर्वोक्त पान देकर तीक्ष्ण करके पत्थर पर पूं पुर करने से भी उस शस्त्र की धार नहीं टूटती है तथा अन्य लोहे पर प्रहार करने से भी वह शस्त्र कुण्ठता (अतीक्ष्णता) को नहीं प्राप्त होता है।
पूर्वापरायत वापी में अधिक समय तक जल ठहरता है। दक्षिणोत्तरायत वापी में जल नहीं ठहरता है; क्योंकि वायु के तरङ्गों से वह वापी नष्ट हो जाती है। यदि दक्षिणो- त्तरायत वापी बनाना चाहे तो तरङ्गों से बचाने के लिये उसके किनारों को मजबूत लकड़ी या पत्थर आदि से चुनवा दे तथा बनाने के समय मिट्टी की हरेक तह को हाथी-घोड़े आदि को उस पर दौड़ाकर बैठाता जाय, जिससे कि मिट्टी दबकर विशेष मजबूत हो जाय।
निबूल, जामुन, बेंत, नीप (एक तरह का कदम्ब)- इन वृक्षों के साथ अर्जुन, बद, आम, पिलखन, कदम्ब और बकुल के साथ कुरषक, ताड़, अशोक, महुआ,
वापी की एक तरफ जल निकलने के लिये पत्थरों से बन्धवाया हुआ एक मार्ग बनाना चाहिये। उस मार्ग को छिद्ररहित लकड़ी के तख्ते से ढककर मिट्टी से दृढ़ कर देना चाहिये।
अञ्जन, मोथा, खस, राजकोशातक, आँवला, कतक का फल-इन सबका चूर्ण कूप में डालना चाहिये।
जो जल गन्दला, कहुआ, खारा, बेस्वाद या दुर्गन्ध वाला हो, वह इन पूर्वोक्त औषधियों के डालने पर निर्मल, मधुर, सुन्दर गन्ध वाला और अनेक गुणों से युक्त हो जाता है।
हस्त, मघा, अनुराधा, पुष्य, धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा-इन नक्षत्रों में कूप का आरम्भ करना शुभ होता है।
वरुण को बलि देकर गन्ध, पुष्य, धूप आदि से बड़ या वेतस की लकड़ी को कोल की पूजन करके पहले शिरास्थान में उसको स्थापित करना चाहिये।
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