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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 93
नमते यत्र धरित्री साधे पुरुषेऽम्बु जाङ्गलानूपे । कीटा वा यत्र विनालयेन बहवोऽम्बु तत्रापि ॥
जिस बहुत जल वाले या स्वल्प जल वाले देश में पाँव रखने से धरती दब जाय और जहाँ विना रहने के स्थान के बहुत-से कीड़े हों, वहाँ डेढ़ पुरुषप्रमाण नीचे जल कहना चाहिये।
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