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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 117
आर्क पयो हुडुविषाणमषीसमेतं पारावताखुशकृता च युतः प्रलेपः । टङ्कस्य तैलमथितस्य ततोऽस्य पानं पश्चाच्छितस्य न शिलासु भवेद्विघातः ॥
शस्त्र पर पहले तिल का तेल मले, फिर मेष के सींग का भस्म तथा कबूतर और चूहे की बीट से युत आक के वृक्ष के दूध का लेप करे, फिर उसको आग में तपा कर पूर्वोक्त पान देवे। ऐसा करने के पश्चात् तेज करके पत्थर पर प्रहार करने से भी उसकी घार नहीं टूटती है।
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