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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 109
ताप्रैः समेता पृषतैर्विचित्रै- रापाण्डु भस्मोष्ट्रखरानुरूपा भृनोपमानुष्ठिकपुष्पिका वा सूर्याग्निवर्णा च शिला वितोया ॥
ताम्र वर्ष के बिन्दुओं से युत, विचित्र बिन्दुओं से युत, पाण्डु वर्ण वाला, भस्म, ऊँट या गदहे के समान वर्ण वाला, अङ्गुष्ठिका वृक्ष के समान नीला, सूर्य या अग्नि के समान वर्ण वाला पत्थर जहाँ पर हो, वहाँ पर जल नहीं होता है।
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