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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 115
तक्रकाञ्जिकसुराः सकुलत्था योजितानि बदराणि च तस्मिन् । सप्तरात्रमुषितान्यभितप्तां दारयन्ति हि शिलां परिषेकैः ॥
छाछ, काँजी, मद्य, कुलथी- इन सबको मिलाकर एक बरतन में सात रात तक छोड़ दे, बाद में अग्नि से तपाई हुई शिला पर उसे बार-बार छिड़कने से शिला फूट जाती है।
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