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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 111
एता अभेद्याच शिलाः शिवाश्च यक्षैश्च नागैश्च सदाभिजुष्टाः । येषां च राष्ट्रेषु भवन्ति राज्ञां तेषामवृष्टिर्न भवेत् कदाचित् ॥
पूर्वकथित समस्त शुभ शिलायें कल्याण करने वाली होती हैं एवं वे सदा ही यक्षों और नागों से सेवित रहती हैं। जिनके राज्य में ये शिलायें होती हैं, उनके यहाँ कभी भी अवृष्टि नहीं होती।
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