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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 1
धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलोपलब्धिः । पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥
वास्तुविद्या का वर्णन करने के पश्चात् अब जिसका ज्ञान होने पर भूमिगत जल का ज्ञान प्राप्त होता है, उस धर्म और यश को देने वाले 'दकार्गल' को कहते हैं। जिस तरह मनुष्यों के अङ्ग में नाड़ियाँ होती हैं, उसी तरह भूमि में भी ऊँची-नीची शिरायें होती हैं। आकाश से केवल एक स्वाद वाला जल पृथ्वी पर गिरता है
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