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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 118
क्षारे कदल्या मथितेन युक्ते दिनोषिते पायितमायसं यत् । सम्यक् शितं चाश्मनि नैप्ति भङ्ग न चान्यलोहेष्वपि तस्य कौण्ठ्यम् ॥
एक अहोरात्र तक तक्र से युत कदली वृक्ष की भस्म में स्थापित लोहे में पूर्वोक्त पान देकर तीक्ष्ण करके पत्थर पर पूं पुर करने से भी उस शस्त्र की धार नहीं टूटती है तथा अन्य लोहे पर प्रहार करने से भी वह शस्त्र कुण्ठता (अतीक्ष्णता) को नहीं प्राप्त होता है।
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