स्निग्धतरूणां याम्ये नरैश्चतुर्भिर्जलं प्रभूतं च । तरुगहनेऽपि हि विकृतो यस्तस्मात् तद्वदेव वदेत् ॥
जहाँ स्निग्ध वृक्ष हों, वहाँ उन वृक्षों से चार पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है तथा जहाँ बहुत वृक्षों के मध्य में एक वृक्ष विकारयुत दिखाई दे तो वहाँ उस विकारयुत वृक्ष से दक्षिण चार पुरुषप्रमाण नीचे हरल होता है।
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