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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 103
या मौश्चिकैः काशकुशैश्च युक्ता नीला च मृद्यत्र सशर्करा च । तस्यां प्रभूतं सुरसं च तोयं कृष्णाथवा यत्र च रक्तमृद्वा ॥
मूझ, काश और कुश से युत भूमि में, पत्थर की कणाओं से मिली हुई नीली मिट्टी बाली भूमि में और काली या लाल मिट्टी वाली भूमि में प्रचुर मात्रा में तथा मधुर जल होता है।
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