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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 125
कृत्वा वरुणस्य बलिं वटवेतसकीलकं शिरास्थाने । कुसुमैर्गन्धैधूपैः सम्पूज्य निधापयेत् प्रथमम् ॥
वरुण को बलि देकर गन्ध, पुष्य, धूप आदि से बड़ या वेतस की लकड़ी को कोल की पूजन करके पहले शिरास्थान में उसको स्थापित करना चाहिये।
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