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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 121
द्वारं च नैर्वाहिकमेकदेशे कार्यं शिलासञ्जितवारिमार्गम् । कोशस्थितं निर्विवरं कपाटं कृत्वा ततः पांशुभिरावपेत्तम् ॥
वापी की एक तरफ जल निकलने के लिये पत्थरों से बन्धवाया हुआ एक मार्ग बनाना चाहिये। उस मार्ग को छिद्ररहित लकड़ी के तख्ते से ढककर मिट्टी से दृढ़ कर देना चाहिये।
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