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बृहत्संहिता • अध्याय 54 • श्लोक 119
पाली प्रागपरायताम्यु सुचिरं धत्ते न याम्योत्तरा कल्लोलैरवदारमेति मरुता सा प्रायशः प्रेरितैः । तां चेदिच्छति सारदारुभिरपां सम्पातमावारयेत् पाषाणादिभिरेव वा प्रतिचयं क्षुण्णं द्विपाश्चादिभिः ॥
पूर्वापरायत वापी में अधिक समय तक जल ठहरता है। दक्षिणोत्तरायत वापी में जल नहीं ठहरता है; क्योंकि वायु के तरङ्गों से वह वापी नष्ट हो जाती है। यदि दक्षिणो- त्तरायत वापी बनाना चाहे तो तरङ्गों से बचाने के लिये उसके किनारों को मजबूत लकड़ी या पत्थर आदि से चुनवा दे तथा बनाने के समय मिट्टी की हरेक तह को हाथी-घोड़े आदि को उस पर दौड़ाकर बैठाता जाय, जिससे कि मिट्टी दबकर विशेष मजबूत हो जाय।
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