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अध्याय 46 — अथोत्पाताध्यायः
बृहत्संहिता
98 श्लोक • केवल अनुवाद
महर्षि गर्ग ने जिन उत्पातों का वर्णन महामुनि अत्रि जी के समक्ष किया था, उन्हीं का संक्षेप रूप यहाँ है।
मनुष्यों के अविनय से पाप इकट्टे होते हैं, उन पापों से उपद्रव होते हैं। दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम उत्पात उन उपद्रवों को सूचित करते हैं।
मनुष्यों के अधिनय से अप्रसत्र देवता गण उन उत्पातों को उत्पन्न करते हैं। उनके निवारण के लिये राजा को शान्ति करानी चाहिये ।
र्य आदि ग्रह और नक्षत्रों के विकारयुत होने का नाम दिव्य उल्का, निर्यात, विकारयुत वायु, सूर्य-चन्द्र का परिवेष, गन्धर्वनगर, इन्द्रधनुष आदि ( रोहत, ऐरावत, दण्ड और परिध) से हुये उत्पातों का नाम आन्तरिक्ष
चलायमान वस्तु के स्थिर और स्थिर के चलायमान होने का नाम भौम उत्पात है। यह भीम उत्पात शान्ति से आहत होकर नष्ट हो जाता है, आनारिक्ष उत्पात शान्ति से कम हो जाता है और दिव्य उत्पात शान्ति से भी नष्ट नहीं होता। यह किसी-किसी आचार्य का मत है ।
अधिक सुवर्ण, अन, गाय और पृथ्वी का दान करने से दिव्य उत्पात भी शान्त हो जाता है, फिर आन्तरिक्ष और भौम को तो बात हो क्या? अर्थात् वे दोनों तो शान्त होते ही है। शिवालय में भूमि पर गोदोहन और कोटिसंख्यक हवन से दिव्य उत्पात शान्त हो जाता है।
अपना शरीर, पुत्र, खजाना, वाहन, नगर, खी, पुरोहित, जनपद- इन आठों में राजा दैव-कल्पित उत्पातों का फल प्राप्त करता है।
शिवलिङ्ग, देवमूर्ति और देवस्थानों का विना कारण फटना, कम्पन होना, उनमें पसीना आना, उनका रोना, गिरना, उनमें शब्द होना आदि (उनका वमन करना और डिसकना) राजा और देश के नाश के लिये होता है।
देवस्थानों में यात्रा के समय गाड़ी की धुरी, पहिया, युग (जुआ) या ध्वजा का भद्र होना, गिरना, उलटना, सादन या कहीं पर चिपट जाना देश और राजा के लिये शुभकारी नहीं है।
मुनि, धर्म, पिता और ब्रह्मा में उत्पन्न विकृति ब्राह्मणों को; महादेव और लोकपालों ( इन्द्र आदि) में उत्पन्न विकृति पशुओं को; बृहस्पति, शुक्र और शनै घर में उत्पत्र विकृति पुरोहितों को;
विष्णु में उत्पन्न विकृति मनुष्यों को, कार्तिकंप और विशाख देव में उत्पन विकृति मण्डलाधिप राजाओं को; वेदव्यास में उत्पत्र विकृति मन्त्री को
गणेश में उत्पत्र विकृति सेनापति को; ग्रह्मा और विश्वकर्मा में उत्पत्र विकृति मनुष्यों को; देवकुमारों में उत्पन विकृति राजकुमारों को; देवकुमारी में उत्पत्र विकृति राजकुमारियों को;
देयाङ्गनाओं में उत्पन्न विकृति राजपत्नियों को एवं देवताओं के दास में उत्पन विकृति राजाओं के रोमकों को अशुभ फल प्रदान करने पालो होती है।
इसी प्रकार राक्षसों में उत्पत्र विकृति राजकुमारों को, पिशाचों में उत्पन विकृति राजकुमारियों को, पक्षों में उत्पन्न विकृति राजपत्नियों को और नागों में उत्पत्र विकृति राजसेवकों को अशुभ फल देने वाली होती है। इन सभी उत्पातों का फल आठ महीने में भटित होता है।
देवता में विकृति को जानकर पवित्र, संपर, स्नान किया हुआ, तीन दिन एक व्रती पुरोहित को विकारयुक्त देवताओं को स्नान, पुष्प, घन्दर,
कत, दहो मिला हुआ भोजन पदार्थ और बॉल आदि से विधिपूर्वक पूजन तथा स्थालोपाक (चर) से उद्देषा का मन्त्र पढ़ते हुये अनि में हवन करना बाहिये।
पूत देयधिकार होने पर रानात रात्रि तक ब्राह्मण और देवताओं की पूजा, गीत, दिलाय करे। इस प्रकार विर राजाओं किया जाता है, उनको पूर्णकान्ति और दक्षिणपात का अनिष्ट फल नहीं होता।
जिस राजा के राज्य में विना अग्नि की ज्वाला दिखाई दे और काष्ठयुत अग्नि प्रज्वलित म हो तो उस राय और देश को पीड़ा होती है।
जल, मांस और गोलो बस्तु में अकारण जलन उत्पत्र हो तो राजा की मृत्यु, खड़ग आदि में जलन उत्पन्न हो तो भयंकर युद्ध और सेनाओं या नगर में अग्नि नहीं मिले तो अग्नि का भय होता है।
प्रासाद (देवगृह), घर, तोरण या ध्वज अग्नि के बिना या बिजली से दग्ध हो जार्थं तो छः मास बाद निक्ष्य ही दूसरे राजा की सेनाओं का आगमन होता है।
अग्नि के बिना धूम अथवा दिन में धूली या अन्धकार दिखाई दे तो अधिक भय होता है तथा रात्रि के समय मेपरहित आकाश में नक्षत्रों का अदर्शन और दिन में दर्शन
नगर, पशु, पक्षी या मनुष्यों में अग्नि के विना जलन पैदा हो तो अधिक भय- कारी होता है। शय्या, वत्र या केशों में धूम, अग्नि को ज्वाला या अग्नि की चिनगारियों दिखाई दें तो स्वामी को मृत्यु होती है।
खड्ग आदियों में जलन उत्पन्न होना, उनका चलायमान होना, उनमें शब्द होना, उनका म्यान से निकल आंना अथवा शत्र में अन्य किसी प्रकार का विकार उत्पन होना- ये सब शीघ्र ही राज्य में भयङ्कर सांयम कराते हैं।
( इसी अध्याय के १८ वे श्लोक से लेकर यहाँ तक अग्निविकारजनित जो अशुभ फल कहे गये हैं, उनको शानित के लिये) आक की लकड़ी, सरसों और घृत से अग्नि में हवन करना चाहिये। इस तरह करने से अशुभ फल की शान्ति होती है। इस उत्पात में ब्राह्मणों को सुवर्ण-दक्षिणा देनी चाहिये।
अचानक वृक्ष की शाखा टूट जाने से युद्ध की तैयारियों, वृक्षों के हँसने से देश का नाश और पृधों के रोने से व्याधि की अधिकतों होती है।
ऋतुवर्जित काल में वृक्षों में पुष्प और फलों की उत्पत्ति होने से राज्य में विभेद, छोटे वृक्ष में बहुत पुष्प आने से बालकों का नाश और वृक्षों से दूध निकलने पर द्रव्यों का नाश होता है।
वृक्ष से मद्य निकलने पर वाहनों (अश्वादिकों का नाश, रक्त निकलने पर युद्ध, शहद निकलने पर रोग, तेल निकलने पर दुर्भिक्ष का भय और वृक्ष से जल निकलने पर अधिक भय होता है।
सूखे हुये वृक्षों में वृक्षों में विरोह (पुनः : अङ्कर) होने से बल और अन्न का नाश तथा गिरे हुये वृक्षों के अपने-आप उठने से दैवजनित भय होता है।
प्रधान वृक्ष में पुष्प और फलों की उत्पत्ति राजा के नाश के लिए और उस ( प्रधान वृक्ष) पर धूप या अग्नि की ज्वाला भी राजा के नाश के लिये ही होती है।
युद्धों के चलने या उनसे किसी प्रकार के शब्द निकलने पर मनुष्यों का नाश होता है। सभी वृक्षों के विकारजन्य फल दश मास में घटित होते है।
इस उत्पात में सुगन्ध द्रव्य, धूप और वस्त्रों से पूजित विकारयुत वृक्ष के ऊपर छत्र रखकर एकादश रुद्रों के मन्त्रों का जप करे।
'स्ट्रेभ्यः स्वाहा' इस मन्त्र से केवल छः बार हवन करे, मृतयुत पायस से ब्राह्मणों को भोजन करावे; साथ ही इस वृक्षविकारजन्य उत्पात में प्राणियों के हितचिन्तक मुनियों ने दक्षिणा में पृथ्वी देने को कहा है।
कमल, जौ आदि (गेहूँ और कौनी) के एक नाल में दो या तीन बाल की उत्पत्ति हो तो क्षेत्र के अधिपति का मरण होता है तथा यमल पुष्प या फलों की उत्पत्ति हो तो भी उसके अधिपति का मरण होता है।
यदि धान्यों को अधिक वृद्धि तथा एक वृक्ष में अनेक प्रकार के फल और पुष्यों की उत्पत्ति हो तो निश्चय हो परचक्र का आगम होता है।
यदि तिल के परिमाण से आधे तेल का परिमाण हो या तिल से बिलकुल तेल नहीं निकलता हो और अत्र में विरसता भालूम हो तो अति भय होता है।
विकारयुत पुष्प और फलों को गाँव से बाहर कर देना चाहिये तथा सोम देव की चरु बनानी चाहिये और शान्ति के लिये बकरा भी दान करना चाहिये।
धान्यों में पूर्वोक्त विकार देखकर पहले उस क्षेत्र को हो ब्राह्मण के लिए दे देना चाहिये और उसी क्षेत्र के मध्य में पार्थिव चरु बनाने से भूमि से उत्पन्न दोष स्वामी को नहीं प्राप्त होता है
अनावृष्टि हो तो दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि हो तो दुर्भिक्ष तथा शत्रुभय, वर्षा ऋतु से भित्र ऋऋतु में गुष्टि हो तो रोग और विना मेघ की वृष्टि हो तो राजा की मृत्यु होती है।
शीत और उष्ण में व्यत्यय होने पर अर्थात् गमों के समय में ठण्डी और ठण्ड के समय में गर्मी पड़ने पर तथा जिस ऋतु का जो धर्म है वह ठीक-ठीक नहीं होने से छः मास बाद राष्ट्र-भय और दैव-जनित (पूर्व-जन्मार्जित पाप के द्वारा) रोग-भय होता है।
वर्षों से भित्र ऋतु में लगातार एक भप्ताह तक वृष्टि होने पर प्रधान राजा का रक्त की वृष्टि होने पर युद्ध और मांस, हट्टी, बस आदि (घृत और तेल) की वृष्टि होने पर मरण, मरो ( मरकी) पड़ती है।
धान्य, सोना, वृक्ष की छाल, फल, पुष्प, आदि ( पत्र आदि) को पुष्टि हो तो भय एवं कोषले और धूलो की गृष्टि हो तो नगर का नाश होता है।
यदि मेघ के विना ओलों की वृष्टि, विकारयुत प्राणियों की वृष्टि या अतिवृष्टि होने पर भी कहीं-कहीं पर छिद्र (अवृष्टि) हो तो धान्यों को ईति (अतिवृष्टि आदि) का भय होता है।
निर्मल सूर्यकिरण होने पर भी यदि वृक्ष आदि द्रव्यों की छाया नहीं दिखाई दे या उल्टी दिखाई दे तो देश में अति भय उत्पन होता है।
मेघरहित आकाश में दिन या रात्रि में इन्द्रधनुष पूर्व या पश्चिम दिशा में दिखाई दे तो अत्यन्त दुर्भिक्ष होता है।
सूर्य, चन्द्रमा, मेप और वायु के विकार-जन्य उत्पात के समय यज्ञ करना चाहिये तथा शाली धान्य, भोज्यान, गाय और सुवर्ण को दक्षिणा ब्राह्मणों को देनी चाहिये। ऐसा करने से पाप की शान्ति होती है।
यदि नगर के मध्य या पास में बहती हुई नदियाँ दूर चली जाएँ या नहीं सूखने बाले हृद आदि सूख जाएँ तो शीघ्र हो नगर प्राणियों से शून्य हो जाता है।
यदि नदियों में तेल, रुधिर या मांस बहने लगें या जल स्वल्प और मलिन हो जाय तो छः मास बाद परचक्र का आगमन होता है।
कूप में अग्नि को ज्याला, पूर्मा, जल का खौलना, रोने का शब्द, गीत या और किसी प्रकार के शब्द लोगों को मृत्यु के सूचक होते हैं।
बिना खोदी हुई जमोन में जल निकलना, जल के गन्ध और रसों में विपर्यय होना तथा जलाशयों में विकार उत्पन्न होना अग्निभय करने वाला होता है। इसकी शान्ति का प्रकार आगे कहते हैं।
बिना खोदी हुई जमोन में जल निकलना, जल के गन्ध और रसों में विपर्यय होना तथा जलाशयों में विकार उत्पन्न होना अग्निभय करने वाला होता है। इसकी शान्ति का प्रकार आगे कहते हैं।
जल में विकार होने पर बरुण के मन्त्रों से पूजा, जप और हवन करना चाहिये। ऐसा करने से भावी अशुभ फल का निवारण हो जाता है।
खियों को किसी प्रकार का प्रसवविकार (घोड़ा, हाथी, बैल, सर्प आदि जन्तु को तरह जातक) होने पर अथवा एक साथ दो, तीन, चार आदि बच्चे होने पर अथवा प्रसवकाल ( 'तत्कालमिन्दुसहितो द्विरसांशको य' इत्यादि से निर्णीत काल) से पहले या बाद में प्रसव होने पर देश और कुल का नाश होता है।
घोड़ी, ऊंटनी, भैंस, गाय और हथिनी को एक साथ दो बच्चे हों तो उन (घोड़ा आदि) का नाश होता है। छः मास बाद प्रसवविकार का फल प्राप्त होता है। इसकी शान्ति संस्कृत व्याख्या में पठित दो श्लोकों द्वारा करानी चाहिये।
अपना हित चाहने वाले मनुष्य को विकारयुत खियों को अन्य देश में ले जाकर परित्याग कर देना चाहिये; साथ ही इच्छानुसार ब्राह्मणों को प्रसत्र कर इस उत्पात को शान्ति करनी चाहिये।
इसी प्रकार विकारयुत चतुष्पदों को भी समूह से अलग कर अन्य स्थान पर ले जाकर त्याग देना चाहिये; अन्यया ये विकारयुक्त चतुष्पद सम्बद्ध नगर, नगर के स्वामी और समूह का नाश कर देते हैं।
एक जाति के पशु दूसरी जाति के पशु के साथ मैथुन करें, गाय या बैल परस्पर एक- दूसरे का स्तनपान करें
तो तीन मास याद निःसंशय परचक्र का आगमन होता है। इसके निवारण के लिये संस्कृत टोका में पठित गर्योक्त दो श्लोक द्रष्टव्य हैं।
विकारयुत पशुओं को छोड़ देने से या दूसरी जगह कर देने से शीघ्र ही चतुष्पदजन्य उत्पातों की शान्ति हो जाती है।
इस उत्पात में ब्राह्मणों को सन्तुष्ट, जप और हवन करना चाहिये तथा चरु, पशु एवं प्राजापत्य मन्त्रों से ब्रह्मा का यज्ञ सम्पत्र कर प्रभूत अत्र की दक्षिणा देनी चाहिये।
यदि अश्व आदि वाहन, बाह (सवार) से अलग होकर भागे, सवार के साथ नहीं चते और रथ का पहिया जमीन में गढ़ जाय या टूट जाय तो राष्ट्र को भय होता है।
यदि आकाश में गीत या तुरही का शब्द सुनाई पड़े या स्थिर पदार्थ चर और चर पदार्थ स्थिर दिखाई दे तो मरण और रोग होता है। अथवा तुरही बजने से विकारयुत शब्द हो तो शत्रुओं से पराजय होती है।
अनभिहतानामताडितानां तूर्याणां नादः शब्दो यदि वा ताडितेष्वाहतेषु शब्दो रखो न स्यात्र भवेत्। तया तूर्याणां व्युत्पत्ती था। विविधा उत्पत्तिर्युत्पत्तिर्नानाशब्दकृत्। परागमः परचक्रस्यागमो भवति नृपते राज्ञो मरणं वा।
बैल और इल का अचानक संयोग हो जाने, दर्दी (चमचा करीठ), शूर्प ( सूप छाज) आदि गृह-सामग्री में विकार उत्पन होने और मृगाल ( गीदड़) के
इन पूर्वोक्त वायव्य विकारों में सत्तू ( सतुआ) से वायु देवता की पूजा करे। नियमयुत होकर ब्राह्मण 'आवायो:' इत्यादि पाँच ऋचाओं का जप करे।
यस से ब्राह्मणों को तृप्त करे और प्रयत्नपूर्वक बहुत अन की दक्षिणा देकर हवन करे।
यदि नगर में रहने वाले पक्षी वन में और ई में रहने वाले पक्षी निर्भय होकर नगर में प्रवेश करें या दिन में चलने वाले पक्षी रात्रि में और रात्रि में चलने वाले पक्षी दिन में चलें
स्त समय में वन में रहने वाले पशु और पक्षी सूर्याभि- मुख होकर मण्डल बांधकर बैठें या सब इकट्टे होकर अधिक शब्द करते हुये दिखाई दें तो भय देने वाले होते हैं।
यदि श्येन (बाज) अधिक रोते हुये की तरह दिखाई दे, सूर्य की तरफ मुख करके शृगाल (गोदढ़) पुरद्वार पर शब्द करे तथा राजभवन में कबूतर या उल्लू प्रवेश करे तो भय देने वाला होता है। कहीं-कहीं पर 'स्यानः' की जगह 'चान:' पाठ मिलता है।
यदि प्रदोष समय में मुर्गा और हेमन्त ऋतु के आदि में कोयल बोलें तथा आकारा में बाज आदि मांस भक्षण करने वाले पक्षी वृत्ताकार मार्ग में प्रदक्षिण क्रम से चलें तो भव देने वाले होते हैं।
घर, प्रधान वृक्ष, तोरण (पुरद्वार) या गृहद्वार पर पक्षियों के समुदायों का गिरना तथा इन्हीं पर आदि पर मधु (शहद) का छत्ता, मल्मोक (पमई) और कमलों की उत्पत्ति नाश के लिये होती है।
यदि कुत्ते हड्डी या शव के कोई अंग घर में ले आयें तो मरी पड़ती है तथा पशु या शल मनुष्य की तरह बोलें तो राजा की मृत्यु होती है, ऐसा मुनियों का वचन है।
मृग और पक्षियों में पूर्वोक्त विकार होने पर दक्षिणा के साथ हवन करे, पाँच ब्राह्मणों के द्वारा 'देवाः कपोत' इत्यादि मन्त्र का तथा एक ब्राह्मण के द्वारा
सुदेवा' इत्यादि मन्त्र का जप करावे, दक्षिणा के साथ गोदान करे और शाकुन सूक्त या खेदसिरांसि इत्यादि मन्त्र का जप करे।
इन्द्रध्वन, इन्द्रकील और स्तम्भद्वार के गिरने या टूटने से तथा कपाट, तोरण और ध्वज के गिरने या टूटने से राजा का मरण होता है।
दोनों सन्ध्याओं में तेज का होना, वन या अग्निरहित स्थान में घूम की उत्पत्ति होना, छिद्राभाव वाली भूमि का फट जाना या कम्पन होना भयकारी होता है।
जिस देश में पाखण्डी और नास्तिक मनुष्यों का भक्त, सज्जनों के आचरणों से रहित, क्रोधी, परछिद्रान्वेषी, खला या सदा युद्ध की इच्छा रखने वाला राजा हो, उस देश का नारा होता है।
जिस स्थान पर शत्र, काठ (छड़ी आदि) और पत्थर हाथ में लेकर 'मारो, छीन लो, काटो, तोड़ डालो' इत्यादि कहते हुये बालक गण एक-दूसरे के ऊपर प्रहार करें: वहाँ शीघ्र भय होता है।
जिस घर को दीवाल पर कोयले, गेरू आदि (पीले और नीले) रङ्गों से विकृत मृत पुरुषों के चित्र बनाये जायें या कोयले आदि से बनाये हुये गृहस्वामी के चित्र दिखाई दें तो वह घर शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
जो घर मकरियों के जाल से व्याप्त हो, दोनों सन्ध्याओं में देवादि के पूजन से रहित हो, प्रतिदिन कलहयुत हो और अपवित्र खियों से युत हो, उसका नाश हो जाता है।
यदि प्रत्यक्ष में राक्षस दिखाई दे तो बहुत शीघ्र मरी पड़ती है। इन पूर्वोक्त उत्पातों के नाश के लिये गर्ग मुनि ने आगे कथित प्रकार की तरह शान्ति कही है।
पूर्वोक्त उत्पातों को अधिक शान्ति करनी चाहिये। बलि और अधिक भोज्य करना चाहिये तथा इन्द्र और इन्द्राणी का अधिक पूजन करना चाहिये ।
राजा के विनाश, देश के ऊपर आपत्ति, केतु के उदय और सूर्य, चन्द्र के ग्रहण के समय उत्पत्र उत्पात तथा आगे कथित की तरह अपने ऋतु में उत्पत्र उत्पात दोष के लिये नहीं होते हैं।
जो उत्पात प्रऋतु-स्वभावजनित दोष को नहीं उत्पान करता है, उनको संक्षेप में कहे गये आऋविपुत्रकृत आगे कथित पद्मों के द्वारा जानना चाहिये ।
बज्र (बिजली), अशनि (पत्थरों की वर्षा या उल्कापात), भूकम्प, दीप्ता, सन्ध्या, निर्घात, शब्द, सूर्य-चन्द्र का परिवेष, धूली, धूम, रक्त वर्ष के रवि का उदयास्त, पृक्षों से भोजन,
मधुरादि रस और तेल आदि को उत्पत्ति, गाय और पक्षियों में काम की वृद्धि- ये सब उत्पात चैत्र और वैशाख मास में कल्याण के लिये होते हैं।
सदा उल्कापात से मलिन आकाश, सूर्य-चन्द्र के पीसे मण्डल, अग्नि के विना ज्याला का शब्द, पूर, पूली और बायु से आहत रक्तकमल की तरह लोहित
लोहित अर्थ की सन्नमा, तरङ्गयुत समुद्र को तरह आकाश, नदियों में जल का सूखना- ये सब उत्पात ग्रीष्म (उपेश और आपाद) में शुभ होते हैं।
इन्द्रधनुष, सूर्य-चन्द्र का परिषद और मूखे वृधों में अङ्कर निकलना, पृथ्वी आर काँपना, उलटना, स्वरूप बदलना, शब्द करना,
सरोक्ते का बर जाना, नदियों भर ऊपर आना, वापी, आदि में अधिक जाल होना, पर्यंत और गृहों का चलायमान होना ये सब उत्पात वर्षा ऋतु में शुभ है।
दिव्य लो, गन्धर्ष, रथ तथा आथर्य करने वाली वस्तुओं का दर्शन, दिन के समय ग्रह-नक्षत्र आदि का दर्शन, वन तथा पर्वतों में
गीत और वाद्यों की ध्वनि, धान्य की वृद्धि और जल की हानि-ये सब शरद् ऋतु में अपाप (शुभ) हैं।
मायु तथा तुषार (बर्फ) में उण्यापन, मृग और पक्षियों का शब्द, राक्षस, यच आदि शानियों का दर्शन, मनुष्य के विना नाणी, अन्धकारमुत आकाश
मनुष्य के विना नाणी, अन्धकारमुत आकाश, वन, पर्यंत और दिशा उया उज्य में सूर्य का उदयास्त होना- ये सब हेमन्त में शुभ है।
हिमपात, वायुसम्बन्धी उत्पात, भयानक प्राणियों का आश्चर्य करने वाला दर्शन, काले अञ्जन की तरह रात और उल्कापात से पीला आकाश, रित्रयों के गर्भ से नाना प्रकार के
( घोड़ा आदि के अङ्गसदृश) प्राणियों की उत्पत्ति, गाय, बकरी, घोड़ा, मृग और पक्षियों के गर्भ से विजातीय प्राणियों की उत्पत्ति, पत्र-लता और अङ्करों में विकार- ये सब शिशिर ऋतु में शुभ होते हैं।
ये प्रऋतु-स्वभावजनित उत्पात अपने ऋतु में शुभ फल देने वाले होते हैं; पर अन्य ऋतु में दिखाई दें तो अति फट देने वाले होते हैं।
विना प्रेरणा के नहीं बोलने वाली यह सत्यरूप सरस्वती पहले देवताओं में विचरण करती थी, बाद में मनुष्यों को प्राप्त हुई।
गणित को नहीं जानने वाले मनुष्य भी पूर्वोक्त उत्पातों को जान कर यशस्वी और राजा के प्रिय होते हैं। यह मुनि का बचन गोपनीय कहा गया है, जिसको जान कर मनुष्य त्रिकालदशों होता है।
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