सूतापटाङ्गशबलं न सन्ख्ययोः पूजितं कलहयुक्तम्। नित्योच्छिष्टत्रीकं च यद् गृहं तत्क्षयं याति ॥
जो घर मकरियों के जाल से व्याप्त हो, दोनों सन्ध्याओं में देवादि के पूजन से रहित हो, प्रतिदिन कलहयुत हो और अपवित्र खियों से युत हो, उसका नाश हो जाता है।
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