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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 67
सन्ध्याद्वयेऽपि मण्डलमावघ्नन्तो मृगा विहङ्गा वा। दीप्तायां दिश्यथवा क्रोशन्तः संहता भयदाः ॥
स्त समय में वन में रहने वाले पशु और पक्षी सूर्याभि- मुख होकर मण्डल बांधकर बैठें या सब इकट्टे होकर अधिक शब्द करते हुये दिखाई दें तो भय देने वाले होते हैं।
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