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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 86
तारोल्कापातकलुषं कपिलार्के न्दुमण्डलम् । अनग्निज्वलनस्फोट घूमरेण्वनिलाहतम्। ॥
सदा उल्कापात से मलिन आकाश, सूर्य-चन्द्र के पीसे मण्डल, अग्नि के विना ज्याला का शब्द, पूर, पूली और बायु से आहत रक्तकमल की तरह लोहित
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