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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 21
धूमोऽ नग्निसमुत्यो रजस्तमश्चाद्विजं महाभयदम् । व्यने निश्युडुनाशो दर्शनमपि चाहि दोषकरम् ॥
अग्नि के बिना धूम अथवा दिन में धूली या अन्धकार दिखाई दे तो अधिक भय होता है तथा रात्रि के समय मेपरहित आकाश में नक्षत्रों का अदर्शन और दिन में दर्शन
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