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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 37
सस्ये च दृष्ट्वा विकृतिं प्रदेयं तत्क्षेत्रमेव प्रथमं द्विजेभ्यः । तस्यैव मध्ये चरुमत्र भौमं कृत्वा न दोषं समुपैति तज्जम् ॥
धान्यों में पूर्वोक्त विकार देखकर पहले उस क्षेत्र को हो ब्राह्मण के लिए दे देना चाहिये और उसी क्षेत्र के मध्य में पार्थिव चरु बनाने से भूमि से उत्पन्न दोष स्वामी को नहीं प्राप्त होता है
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