शीतोष्णविपर्यासो नो सम्यगृतुषु च सम्प्रवृत्तेषु । षण्मासाद्राष्ट्र भयं रोगभयं दैवजनितं च ॥
शीत और उष्ण में व्यत्यय होने पर अर्थात् गमों के समय में ठण्डी और ठण्ड के समय में गर्मी पड़ने पर तथा जिस ऋतु का जो धर्म है वह ठीक-ठीक नहीं होने से छः मास बाद राष्ट्र-भय और दैव-जनित (पूर्व-जन्मार्जित पाप के द्वारा) रोग-भय होता है।
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