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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 45
सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां यागः स्मृतो वृष्टिविकारकाले । धान्यात्रगोकाञ्चनदक्षिणाश्च देयास्ततः शान्तिमुपैति पापम् ॥
सूर्य, चन्द्रमा, मेप और वायु के विकार-जन्य उत्पात के समय यज्ञ करना चाहिये तथा शाली धान्य, भोज्यान, गाय और सुवर्ण को दक्षिणा ब्राह्मणों को देनी चाहिये। ऐसा करने से पाप की शान्ति होती है।
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