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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 64
वायव्येष्वेषु नृपतिर्वायुं आवायोरिति पश्चचों जप्तव्याः शक्तुभिरर्चयेत् । प्रयतैर्द्विजैः ॥
इन पूर्वोक्त वायव्य विकारों में सत्तू ( सतुआ) से वायु देवता की पूजा करे। नियमयुत होकर ब्राह्मण 'आवायो:' इत्यादि पाँच ऋचाओं का जप करे।
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