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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 2
अपचारेण नराणामुपसर्गः पापसञ्चयाद्भवति । संसूचयन्ति दिव्यान्तरिक्षभौमास्त उत्पाताः ॥
मनुष्यों के अविनय से पाप इकट्टे होते हैं, उन पापों से उपद्रव होते हैं। दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम उत्पात उन उपद्रवों को सूचित करते हैं।
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