इति विबुधविकारे शान्तयः सप्तरात्रं द्विविबुधगणार्या गीतनृत्योत्सवा छ । विधिवट्वनिपालैर्यः प्रयुक्ता न तेषां भवति दुरितपाको दक्षिणाभिक्ष रुजाः ॥
पूत देयधिकार होने पर रानात रात्रि तक ब्राह्मण और देवताओं की पूजा, गीत, दिलाय करे। इस प्रकार विर राजाओं किया जाता है, उनको पूर्णकान्ति और दक्षिणपात का अनिष्ट फल नहीं होता।
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