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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 24
मन्त्रैराग्नेयैः क्षीरवृक्षात् समिन्द्धिहॉतव्योऽग्निः सर्षपैः सर्पिषा च। अग्न्यादीनां वैकृते शान्तिरेवं देयं चास्मिन् काञ्चनं ब्राह्मणेभ्यः ॥
( इसी अध्याय के १८ वे श्लोक से लेकर यहाँ तक अग्निविकारजनित जो अशुभ फल कहे गये हैं, उनको शानित के लिये) आक की लकड़ी, सरसों और घृत से अग्नि में हवन करना चाहिये। इस तरह करने से अशुभ फल की शान्ति होती है। इस उत्पात में ब्राह्मणों को सुवर्ण-दक्षिणा देनी चाहिये।
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