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बृहत्संहिता • अध्याय 46 • श्लोक 89
सरोनद्युदानानां प्रवपूर्ध्वतरणनवाः । सरणं चाद्रिगेहानां वर्षासु न भयावहम् ॥
सरोक्ते का बर जाना, नदियों भर ऊपर आना, वापी, आदि में अधिक जाल होना, पर्यंत और गृहों का चलायमान होना ये सब उत्पात वर्षा ऋतु में शुभ है।
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