ये च न दोषान् जनयन्युत्पातानृतुस्वभावकृतान् । ऋषिपुत्रकृतैः शलोकैर्विद्यादेतैः समासोक्तैः ॥
जो उत्पात प्रऋतु-स्वभावजनित दोष को नहीं उत्पान करता है, उनको संक्षेप में कहे
गये आऋविपुत्रकृत आगे कथित पद्मों के द्वारा जानना चाहिये ।
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