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अध्याय 8 — अष्टमोल्लासः

कुलार्णव
97 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! हे करुण रूप अमृत के समुद्र! मैं उल्लास के भेद के विषय में सुनना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! हे देवेश! द्रव्यपात्रादि की सङ्गति, रति, उद्वासनकाल (Time of abandonment), श्री चक्र की स्थिति और कौलिक शक्तियों की चेष्टा के विषय में बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आप पूँछती हैं, उसे मैं बताऊँगा, जिसके सुनने मात्र से दिव्यभावना उत्पत्र होती है।
'उल्लास' सात है - १. आरम्भ, २. तरुण, ३. यौवन, ४. प्रौढ़, ५. प्रौढान्त, ६. उन्मना और ७. मनोल्लास (वश्योल्लास)।
हे कुलनायिके! तीन तत्त्वों के उदित होने से 'आरम्भ' उल्लास होता है। हे अम्बिके! तरुणसुख के होने पर 'तरुणोल्लास' माना जाता है। हे प्रिये! मन के सम्यक् उल्लास की स्थिति को 'यौवनोल्लास' कहा जाता है और दृष्टि, मन, वचन का स्खलन होने पर 'प्रौढ़ोल्लास' होता है।
चक्र में समुल्लास की स्थिति होने पर यदि पात्रमेलन की इच्छा हो, तो कभी भी पहले प्रौढ उल्लास न करे और अधिकार के अनुसार ही पात्रमेलन करे।
अदीक्षित, अनाचारी, अतन्त्रज्ञ, इष्टदेव से रहित, दोषभाव रखने वाले, समयाचार से भ्रष्ट साधक से द्रव्य की संगति न करे।
अज्ञानी, अहङ्कारी, प्रपञ्ची, पशुभावापत्र, क्षुद्र कर्म करने वाले साधक से द्रव्य की संगति न करे।
स्त्रीद्वेषी, गुरुओं से अभिशप्त, भक्तिहीन, दुरात्मा, कुलोपदेश से हीन को द्रव्य संगति नहीं करनी चाहिए और पदवाक्य प्रमाण एवं श्रुति स्मृति के अर्थ जानने वाला भी यदि कुलधर्म से अनभिज्ञ है, तो उसके साथ द्रव्यपात्र की सङ्गति नहीं करनी चाहिए।
अच्छे कुल में उत्पन्न हो या आचारवान् वृद्ध हों, यदि आपकी पूजा से बिमुख हैं, तो उनका सङ्ग छोड़ दे।
हे पार्वति! सुनिए, स्त्री पुत्र, मित्र, बन्धु कितने ही घनिष्ठ क्यों न हों, यदि कुलाचार को नहीं जानते, तो उनकी सङ्गति न करे।
दूसरे देश के निवासियों के साथ, जिनका परिचय अज्ञात है, द्रव्यसङ्गति तब तक न करे, जब तक 'संकेत' द्वारा 'योग' (ऐक्यभाव) न हो।
भले ही स्वयं कुलेश्वर क्यों न हो, 'एक पात्र' न करे अर्थात् एक ही पात्र द्वारा द्रव्यपान न करे। अन्यथा मन्त्र विपरीत हो जाते हैं और पग-पग पर विघ्न होते हैं।
अपने पात्र का हेतु (मद्य) भैरव को अर्पित न करे, यदि वह फिर भी देता है तो हे कुलेशानि! देवता का शाप उसे प्राप्त होता है।
अपना आसन, भोजन, पात्र, वस्त्र और शैय्या आदि अनभिज्ञ और अयोग्य लोगों को न दे और उनका सङ्ग कभी न करे।
स्रोत भेद से अर्थात् आम्नाय के विभागों के अनुसार कौलिक को पात्र की सङ्गति करनी चाहिये। पूर्व और दक्षिण, उत्तर और पश्चिम आम्नायों में ऐक्यभाव है।
अतः इन चारों स्रोतों के क्रमार्चन में तत्पर अपने समान वीर साधकों और स्त्रियों के साथ सङ्गति करे।
हे प्रिये! योगियों और योगिनियों द्वारा प्रदत्त पूर्ण पात्र को अपनी मातृका और मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित कर पान करे।
कभी यदि दैवयोग से अलिपात्र (मद्यपूर्ण पात्र) प्राप्त हो, तो भक्ति से ग्रहण कर पूर्ववत् अभिमन्त्रित कर हे देवि! गुरुदेव का स्मरण करते हुये उसे पान करे।
चक्र में उच्छिष्ट पान भक्षण का नियम हे पार्वति! गुरुशक्ति, गुरुपुत्र और अपने से ज्येष्ठ साधक का उच्छिष्ट खाना चाहिये, अन्य का नहीं।
शक्ति का उच्छिष्ट द्रव्य पीना चाहिये और वीरों का उच्छिष्ट चर्वण खाना चाहिये। अपना उच्छिष्ट न देना चाहिये और न दूसरों का खाना चाहिये।
स्त्रियों का उच्छिष्ट तो खाये। किन्तु हे देवेशि! उन्हें अपना उच्छिष्ट चक्र में भी न दे। अन्यथा पतन होता है।
हे अम्बिके! केवल अपने कनिष्ठ शिष्यों को ही उच्छिष्ट दे। जो स्नेह, लोभ या भयवश अन्य किसी को उच्छिष्ट आसव या पात्र देता या लेता है, वह देवता के शाप को प्राप्त करता और आपत्ति में पड़ता है।
हे कुलेशानि! प्रौढोल्लास होने पर पूजागृह से बाहर या गृह के भीतर एक त्रिकोण बनाकर गन्धपुष्पाक्षतों से उसकी पूजा कर गदा, त्रिशूल, डमरु और पात्र हाथ में लिए हुए त्रिलोचन एवं कृष्ण वर्ण के सभी विघ्नों का निवारण करने वाले उच्छिष्टभैरव का ध्यान करना चाहिए। यथा- गदात्रिशूलडमरुपात्रहस्तं त्रिलोचनम् । कृष्णाभं भैरवं ध्यायेत् सर्वविघ्ननिवारणम् ।।
तीन तार अर्थात् ॐ ॐ ॐ का उच्चारण कर 'उच्छिष्ट भैरव' कहे। फिर दो बार 'ऐहि' पद और दो बार 'गृण' पद कहकर फट् एवं स्वाहा कहे। यह २२ अक्षरों का बलि प्रदान करने का मन्त्र है। विमर्श - इस प्रकार निम्न २२ अक्षरों वाले मन्त्र से बलि प्रदान करे:- ॐ ॐ ॐ उच्छिष्टभैरव एहि एहि बलिं गृह्मण गृहण फट् स्वाहा। तदनन्तर 'शान्तिस्तव' का पाठ कर अलि (मद्य) बिन्दुओं से तर्पण करे।
जो योगिनी देवियाँ भगवान् शङ्कर के चरण कमल की पूजा किया करती है, प्रसन्न, (शङ्कर के) बाम भाग में स्थित, मोक्ष प्रदान करने वाली, अनन्त सिद्धान्तों में प्रवेश के लिए बुद्धि का प्रबोधन करने वाली चौंसठ योगिनियों के समूह को मैं प्रणाम करता हूँ।
योगिनी चक्र के मध्य विराजमान, मातृ मण्डल से वेष्टित (घिरे हुए) भैरवी के प्रिय नाथ भैरव को मैं शिरसा नमन करता हूँ।
कुल (शक्ति) रूप (भव रोग के लिए) औषधि का विधान करने वाले अनादि एवं घोर संसार (की आसक्ति) को नष्ट करने वाले श्री नाथ रूप वैद्य के लिए नमस्कार है।
समयाचार के उल्लंघन से ही आपत्ति, पाप एवं रोग होते हैं। वे सभी बाधाएँ दिव्य (श्री) चक्र के मेलन (पूजन) से समाप्त हो जायें।
आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, कीर्ति, लाभ, सुख, विजय, शरीर की मनोहर कान्ति (श्री) चक्र के पूजन से प्राप्त होए और सभी (चक्रस्थ) देवता मेरी रक्षा करें।
सम्यक् विधानानुसार पूजन करने वाले, प्रतिपालन करने वाले, यतीन्द्र, योगीन्द्र तथा तपस्वीगणों की, देश, राष्ट्र, कुल के अधिपति की भगवान् कुलेश (शक्ति के स्वामी भगवान् शङ्कर) शान्ति प्रदान करें।
जो साधक कुल के अद्वितीय दर्शक हैं एवं जो सिंहासनादि पर आसीन महाकुलीन (शाक्त) हैं वे आनन्दित होवें। अन्य सभी कुल में संलग्न कौल तथा जो विशेष (मोक्ष) पद के भेदक शम्भु के उपासक हैं वे प्रसन्न होएं।
सिद्धगुरु गण और उनके अनुक्रम के ज्ञाता साधक, ज्येष्ठ सन्तान, समयाचार का पालन करने वाले, बटुक तथा कुमारियाँ आनन्दित होवें। जो वीर कुल (सम्प्रदाय) में जन्म लेने वाले योगिनियों के श्रेष्ठ उपासक हैं, पृथ्वी के स्वामी (राजा), गो, द्विज एवं समस्त सज्जनों का सम्प्रदाय प्रसत्र होए।
नीति निपुण एवं निरवद्यनिष्ठ, निर्मत्सर, उपमारहित, उपद्रवों से रहित कुल साधक प्रसन्न होएँ। नित्य शिव में आसक्त, इच्छारहित गुरु गण शान्त मन वाले होऐं। हृदय के शोक की शङ्का भी न रहे और सभी चराचर जगत् शान्ति प्राप्त करें।
योग में संलग्न और कुल योग (शक्ति उपासक) से युक्त जन आनन्दित होवें। आचार्य और सामयिक साधक के पुत्र प्रसत्र होऐं। गाएँ, द्विज, युवतियाँ, सन्यासी और कुमारियाँ कुल धर्म में प्रवृत्त हों तथा गुरुभक्त लोक कुलधर्म में परायण हों।
आत्मनिष्ठ साधकों के समूह आनन्दित हों समायाचार से द्वेष करने वाले योगिनियों के शाप से नष्ट हों। वह सामरस्य की अवस्था वाली शम्भु की पत्नी पार्वती मेरे हृदय में प्रकट हो जायें। जिस शक्ति के गुरु रूप चरण कमल ही सत्य हैं वे हमारे हृदय में स्फुरण करें।
जो देवी (श्री) चक्र में, (पूजा) क्रम में, भूमिका (भूपुर) में वास करने वाली एवं नाड़ियों में निवास करने वाली देवियाँ हैं, जो देवियाँ शरीर के रोमकूपों में तथा (मांस मज्जा आदि) धातुओ में विराजमान हैं, उच्छ्वास एवं निःश्वास रूपी प्राणवायु की महान् तरङ्गों में निवास करने वाली देवियाँ है, वे कौलों द्वारा अर्चित शत्रु पक्ष का भक्षण करते हुए मेरे मन्त्रों से पूजित होकर मेरे यज्ञ में तृप्त होवें।
जो कुल (धर्म) में उत्पन्न देवियाँ हैं, जो आकाश एवं जल में निवास करने वाली देवियाँ है जो नित्य एवं प्रसन्न प्रभा से युक्त निधि में रहने वाली हैं और जो जो पृथ्वी पर प्रकृष्ट रूप से स्थित है, जो आकाश में स्थित बादलरूपी अमृत से युक्त है, जो देवियों सर्वदा सभी स्थानों में सर्वत्र गमन करने वाली हैं, वे कुलमार्ग के पालन में परायण देवियाँ मुझे शान्ति प्रदान करें।
ब्रह्माण्ड से ऊपर स्वर्ग में, गगन में, भूमि पर, ताल तलैया में, पाताल में, अग्नि में, जल में, वायु में (इन सभी पञ्चमहाभूतों में) जहाँ कहीं भी स्थित देव है, (तीर्थ) क्षेत्र में, पीठों में, उपपीठों में जहाँ भी धूप एवं दीप आदि (पंचोपचारों से) प्रसन्न देवियाँ हमारी शुभ बलिदान विधि से पूजित एवं वीरेन्द्र से बन्ध वे देवियाँ सदा हमारी रक्षा करें।
ब्रह्मा, लक्ष्मी, शेषनाग, दुर्गा, कार्तिकेय, बटुकगण, भैरव एवं क्षेत्रपाल आदि, रुद्र, आदित्य, ग्रह, वसु पितर, मुनिगण, सिद्ध तथा गुह्यक आदि, भूत, गन्धर्व विद्याधर, ऋषि, पितर, किन्नर, यक्ष एवं नाग योगीश एवं चारण आदि, सुरश्रेष्ठ के समूह हमारे पूजन में सन्तुष्ट होवें।
देहस्थ अखिल देवगण, गजानन, क्षेत्राधिप, भैरव, योगिनियाँ, बटुक, यक्ष, पितर, भूत, पिशाच, ग्रह, अन्य भूचारी एवं आकाश में विचरण करने वाले, दिशाओं में विचरण करने वाले, वेताल, चेटक (इन्द्रजालक) और पितर गण, कुल पुत्र (कुल के उपासक) योगी के दीप्त चरु को पीकर तृप्त होवें।
यदि गुरुवाक्य सत्य है, पितर, देव, आगम एवं योगिनी सत्य है, यदि परदेवता प्रसन्न है और यदि वेद प्रमाण है, यदि शाक्त दर्शन सत्य है, यदि (गुरु या शक्ति की) आज्ञा अमोध है तो कौल धर्म भी सत्य है अतः मुझ कौल की सर्वदा जय होए।
सभी साधक गण प्रसत्र होंवे। कुलधर्म को दूषित करने वाले पाखण्डियों का विनाश होवे। मुझमें शम्भु से सम्बन्धित अवस्था (शाम्भवी मुद्रा) हो और मेरे गुरु सदैव प्रसन्न रहें।
यदि यह भैरवी देवी हैं और यदि भैरव का शासन है तथा यदि यह कुलधर्म है तो कुल के दूषक नष्ट हो जायँ।
जिन (शक्ति) की आज्ञा के प्रभाव से तीनों लोक प्रतिष्ठित हुए उन समस्त योगिनियों को निरन्तर नमस्कार है।
मेरे देह में विद्यमान सभी (ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि) माताएँ पान करें और कुल श्रेष्ठ गण पान करें तथा सभी भैरव पान कर तृप्त होवें।
सभी (ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि) माताएँ एवं गणाधिपों के सहित समुद्र और मेरे देह में वास करने वाले योगिनी एवं क्षेत्रपाल गण पान करें।
शिव आदि देवगण, पृथ्वी पर्यन्त सृष्टि युक्त ब्रह्मादि, काल, अग्नि, भवानी एवं जगत् मेरे यज्ञ से तृप्त होवें।
द्वार पर निवास करने वाले, श्रीनन्दन के उद्यान में मणिमण्डप के चारों ओर स्थित, शून्य गृह में, विहार एवं कन्दरा तथा मठ (देवालय) में, आकाश में, श्मशान में स्थित देव, कूपस्थान में, चौराहे पर रहने वाले, सम्यक् प्रदेश में निवास करने वाले, पर्यङ्क (पलंग) पर, वायु में, झण्डे या बुर्जियों पर तथा फूलों में रहने वाले तदभिमानी देवगण मेरे यज्ञ को ग्रहण करे तथा मेरी रक्षा करें।
चक्र में स्थित साधकों की चेष्टाएं - हे प्रिये! शान्ति स्तोत्र का पाठकर पूजापात्र को उठाकर हे कुलनायिके! गुरुदेव अपने शिष्य को प्रसाद दें।
चक्र में सम्मिलित साधकों द्वारा अपनी अभीष्ट चेष्टा का करना 'प्रौढान्त' उल्लास कहा गया है। हे देवि! इस उल्लास से योगी और योगिनीमण्डल के प्रमुदित होने पर क्रमशः आनन्द होता है और उन उल्लासित वीरों में कार्याकार्य का विचार नहीं रहता।
हे परमेश्वरि! इच्छा ही शास्त्रसम्पत्ति है, यही आज्ञा है, अतः उक्त अवस्था में जो शुभ या अशुभ कर्म होते हैं, हे सुरसुन्दरि! वे सब देवता प्रीति के लिए होते हैं।
उस समय का वार्तालाप जपफल होता है, तन्द्रा समाधि होती है, हे देवि! भैरवी बलि देने पर विशेष क्रियायें पूजा है, शक्ति संयोग मोक्ष होता है और उस समय का भाषण स्तोत्र होता है।
हे ईशानि! अङ्गों का स्पर्श न्यास, भोजन हवन की क्रिया, देखना ध्यान और सोना बन्दनास्वरूप होता है।
इस प्रकार उक्त उल्लास में विविध प्रकार की जो चेष्टा की जाती है, वह सत्क्रिया ही होती है। उसके सम्बन्ध में उचित अनुचित का विचार जो करता है, वह पाप का भागी होता है।
इस चक्र में प्रविष्ट होने वाले वीर परम योगी होते हैं, जिससे मनुष्य साक्षात् भैरव स्वरूप को प्राप्त करते हैं।
हे देवि! प्रसन्नता, परमानन्द, ज्ञानवृद्धि, में गिरना, वंशी-वीणादि बजाना, कविता बनाना, रोना, भाषण करना, गिरना, उठना, जंभाई लेना, चलना ये विक्रियायें योग के समान होती हैं।
हे देवेशि! इस चक्र में वीर योगी और योगिनियाँ मादकता से शिथिल होकर अपने मन के उल्लास के अनुसार आचरण करते हैं।
स्वयं के विचार को भूल कर बगल में बैठे हुए साधकों से धीमे-धीमे पूछते हैं और मुख में पात्र डालकर शान्त बैठते हैं।
मतवाली कान्ता दूसरे को अपना पुरुष समझ कर उसका सहारा लेती है। उसी प्रकार प्रौढान्त उल्लास से युक्त पुरुष भी करता है।
मोहवश पुरुष पुरुष का आलिङ्गन करता है। मुग्धा स्त्री अपने पति से पूछती है कि आप कौन हो, मैं कौन हूँ और ये लोग कौन हैं? किस कार्य से हम आये हैं, किसलिये यहाँ बैठे हैं? क्या यह उद्यान है, घर है या क्या यह आंगन है?
मुख में मदिरा को भर कर स्त्रियों को पान कराते हैं। तीक्ष्ण तत्त्व को अपने मुख में डालते हैं और अपनी प्रिया के मुख में डालते हैं।
हे शाम्भवि! योगी लोग एक दूसरे के पात्रों और खाद्य पदार्थों को ग्रहण करते हैं तथा मद्यपात्र को शिर पर रख कर नृत्य करते हैं।
कुलशक्तियाँ बिना जाने हुए ताली बजाती हैं और ऐसे गीत गाती है, जिनके अक्षर स्पष्ट नहीं होते तथा लड़खड़ाते पैरों से नृत्य करती हैं।
मदमत्त योगी स्त्रियों के वक्षस्थल के ऊपर गिरते हैं और मदाकुल योगिनियाँ पुरुषों के ऊपर गिरती है।
हे कुलनायिके! एक दूसरे के मनोरथ सुख को पूर्ण करते हुये इस प्रकार की अनेक चेष्टाएँ करते हैं।
मन के विकृत न होने पर देव-भाव-मन के विकार को हटाकर जब उल्लास प्रवर्तित होता है तब श्रेष्ठ योगी देवताभाव को प्राप्त करते हैं।
हे कुलनायिके! भैरवावेश में आए कौलिकों की जो मूर्ख निन्दा करता है, उसका नाश योगिनियाँ करती हैं, इसमें सन्देह नहीं।
चक्र में मधु की मादकता से शिथिल लोगों की न कभी निन्दा करे और न उनका उपहास ही करे और इस चक्र में हुई बातों को बाहर कभी प्रकट न करे।
न उनके प्रति द्रोह करे और न उनका अहित करे। भक्ति से उनका सत्कार करे और प्रयत्न करके उन्हें गुप्त रखे।
चक्र में मदाकुल साधकों को देखकर देवताबुद्धि से ध्यान करे और प्रसन्न होकर भक्तिपूर्वक उनकी वन्दना करे। हे प्रिये! इस प्रकार से जो कौलिक चक्र का दर्शन भक्तिपूर्वक करता है, वह योगिनीपद को पाता है और करोड़ों व्रत, तीर्थ, तप, दान एवं यज्ञादि का फल प्राप्त करता है।
उन्मना उल्लास, अनवस्था और शाम्भवी मुद्रा - 'उन्मना' नामक छठे उल्लास से युक्त होने पर गिरने और उठने की दो क्रियायें तथा बारम्बार मूर्छा होती है। परब्रह्म के अनुसन्धान की इच्छा से युक्त इन दो क्रियाओं के चिरकाल तक सम्पन्न होने पर देह और इन्द्रियों से परे अनवस्था होती है, जो सातवें उल्लास में है।
परामन्त्रस्वरूप होकर वह परामूच्र्छना को प्राप्त करता है क्योंकि मूर्छना का सान्निध्य ही मुक्ति का मूल कहा गया है।
बाह्य दृष्टि निमेष (बन्द करना) और उन्मेष (खोलना) से रहित होकर लक्ष्य अन्तर्मुख हो जाता है। यही अधखुली आँखों वाली शाम्भवी मुद्रा है, जो सब तन्त्रों में गुप्त है।
यह मुद्रा सभी में श्रेष्ठ है। स्वाद और रूप का सामरस्य सदा इसमें अहन्त रहता है। इससे उल्लासित वीर साक्षात् शिव एवं शिवा ही हैं, इसमें सन्देह नहीं।
अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। यह सुख किस प्रकार का होता है? इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
इस अवस्था में वे मन वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है।
इस ध्यान में देवावेश कराने वाला जो सुख होता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता क्योंकि उसमें विशेष ज्ञान प्राप्त करने वाला प्रबुद्ध होकर समाहित होता है।
ब्रह्मध्यान के परमानन्द में तल्लीन होने वाले मनुष्य बड़े पुण्यवान् होते हैं। उस ध्यान के क्षण भर के लिए भी अन्तर्हित होने पर वे शोक करते हैं और हतप्रभ हो जाते हैं। सुख का यह महान् फल सातवें उल्लास से युक्त आपके भक्तों को मिलता है।
सप्तमोल्लास में प्राप्त आठों प्रत्यय, आठों अवस्थाएं और आठों सिद्धियाँ - हे कुलेश्वरि! सातवें उल्लास में त्रिकालज्ञान से उत्पन्न आठ प्रत्यय होते हैं और कम्प आदि आठ अवस्था होती है। हे कुलेश्वरि! इसमें संशय नहीं करना चाहिए।
अधिक कहने से क्या, अणिमादि आठों सिद्धियां सेविका बन जाती हैं और चिर काल तक घर में रहकर सेवा करती हैं।
जो शुभ गुण पञ्चमुख परमेश्वर के शरीर में हैं, वे तत्त्वज्ञान से युक्त गुण कुलतत्त्व के ज्ञाता में होते हैं।
१. आरम्भ, २. तरुण, ३. यौवन, ४, प्रौढ और ५. प्रौढान्त-ये उल्लास जाग्रत् कहे गये हैं। ६ उन्मना उल्लास स्वप्न है और ७ अनवस्था उल्लास सुषुप्ति है, जो तीनों अवस्थाओं से युक्त है। इन सातों उल्लासों को जो जानता है, वह मुक्त है और कौलिक है।
भैरवी चक्र में प्रविष्ट सभी वर्ण द्विजाति-वत् होते हैं, जातिभेद नहीं रहता । चक्र के समाप्त होने पर सभी वर्ण अलग अलग हो जाते हैं अर्थात् सामाजिक अनुशासन पुनः लागू हो जाता है।
स्त्री हो या पुरुष, नपुंसक हो अथवा चाण्डाल हो या उत्तम द्विज, इस चक्र में कोई भेद नहीं रहता। वे सभी शिवसमान ही माने जाते हैं।
जिस प्रकार झरने आदि के जल गङ्गा में पहुँचकर समान भाव को प्राप्त करते है, उसी प्रकार श्रीचक्र में सभी मनुष्य एकत्व को प्रप्त करते हैं।
दूध के साथ जल जिस प्रकार दूध ही होता है, उसी प्रकार श्रीचक्र के मध्य जातिभेद नहीं रहता।
स्वर्गादि पुण्य लोकों में जैसे देवताओं के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है, वैसे ही चक्र के मध्य में सभी मनुष्य देवता ही होते हैं।
इस चक्र में जाति भेद नहीं है, सभी शिव के समान माने जाते हैं। वेद में भी इस प्रकार की स्थिति वाले सभी ब्रह्मस्वरूप कहे गए हैं।
यहाँ अधिक कहने से क्या, हे कुलेश्वरि! चक्र के मध्य में सभी पुरुष मेरे स्वरूप और हे प्रिये! स्त्रियां आपका स्वरूप होती है।
चक्र के मध्य में जो मूर्ख जातिभेद मानता है, हे कुलनायिके! उसे योगिनियाँ खा जाती हैं और आपसे उसे शाप प्राप्त होता है।
चक्र में स्त्रियों और पुरुषों को चाहे अलग अलग स्थान में बिठावें या दम्पति के रूप में या पंक्ति में अथवा चक्राकार स्थान दे। हे प्रिये! शिवशक्ति के रूप में उन सबकी 'चक्र में पूजा करे।
हम दोनों या लक्ष्मी-नारायण अथवा सरस्वती-ब्रह्मा जिस प्रकार संयुक्त हैं, उसी प्रकार साधक सशक्ति वीर होता है।
हे वरारोहे! सहस्रों मद्य घटों और सैकड़ों मांस राशियों से भी मैं भगलिङ्गामृत बिना सन्तुष्ट नहीं होता।
यह संसार न चक्र चिह्न वाला है, न पद्म चिह्न वाला और न वज्र चिह्न वाला है। लिङ्ग चिह्न और भग चिह्न वाला ही यह है। अतः यह संसार शक्ति शिवात्मक है।
शिवशक्ति समायोग से समाधि-जिस समय शिव और शक्ति का समायोग होता है, वही कुलधर्मनिष्ठ साधकों का सन्ध्याकाल है, जिसमें समाधि की स्थिति का अनुभव होता है।
कामुकता का निषेध कामवासना से युक्त होकर अदीक्षित (अनियन्त्रित) स्त्रियों में न जाय। सद्यः संस्कार से शुद्ध स्त्रियों में ही जाना चाहिए।
इस प्रकार मैंने तीनों तत्त्व, उल्लास और पान के भेदादि का वर्णन संक्षेप में किया। अब हे कुलेशानि! आप क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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