अध्याय 8 — अष्टमोल्लासः
कुलार्णव
97 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्रह्माण्ड से ऊपर स्वर्ग में, गगन में, भूमि पर, ताल तलैया में, पाताल में, अग्नि में, जल में, वायु में (इन सभी पञ्चमहाभूतों में) जहाँ कहीं भी स्थित देव है, (तीर्थ) क्षेत्र में, पीठों में, उपपीठों में जहाँ भी धूप एवं दीप आदि (पंचोपचारों से) प्रसन्न देवियाँ हमारी शुभ बलिदान विधि से पूजित एवं वीरेन्द्र से बन्ध वे देवियाँ सदा हमारी रक्षा करें।
ब्रह्मा, लक्ष्मी, शेषनाग, दुर्गा, कार्तिकेय, बटुकगण, भैरव एवं क्षेत्रपाल आदि, रुद्र, आदित्य, ग्रह, वसु पितर, मुनिगण, सिद्ध तथा गुह्यक आदि, भूत, गन्धर्व विद्याधर, ऋषि, पितर, किन्नर, यक्ष एवं नाग योगीश एवं चारण आदि, सुरश्रेष्ठ के समूह हमारे पूजन में सन्तुष्ट होवें।
देहस्थ अखिल देवगण, गजानन, क्षेत्राधिप, भैरव, योगिनियाँ, बटुक, यक्ष, पितर, भूत, पिशाच, ग्रह, अन्य भूचारी एवं आकाश में विचरण करने वाले, दिशाओं में विचरण करने वाले, वेताल, चेटक (इन्द्रजालक) और पितर गण, कुल पुत्र (कुल के उपासक) योगी के दीप्त चरु को पीकर तृप्त होवें।
द्वार पर निवास करने वाले, श्रीनन्दन के उद्यान में मणिमण्डप के चारों ओर स्थित, शून्य गृह में, विहार एवं कन्दरा तथा मठ (देवालय) में, आकाश में, श्मशान में स्थित देव, कूपस्थान में, चौराहे पर रहने वाले, सम्यक् प्रदेश में निवास करने वाले, पर्यङ्क (पलंग) पर, वायु में, झण्डे या बुर्जियों पर तथा फूलों में रहने वाले तदभिमानी देवगण मेरे यज्ञ को ग्रहण करे तथा मेरी रक्षा करें।
हे देवि! प्रसन्नता, परमानन्द, ज्ञानवृद्धि, में गिरना, वंशी-वीणादि बजाना, कविता बनाना, रोना, भाषण करना, गिरना, उठना, जंभाई लेना, चलना ये विक्रियायें योग के समान होती हैं।