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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 77
यत्सुखं विद्यते ध्याने देवावेशकरं परम् । कथितुं नैव शक्नोमि प्रबुद्धस्तत्समाहितः ॥
इस ध्यान में देवावेश कराने वाला जो सुख होता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता क्योंकि उसमें विशेष ज्ञान प्राप्त करने वाला प्रबुद्ध होकर समाहित होता है।
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