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कुलार्णव • अध्याय 8 • श्लोक 56
सम्मोदः परमानन्दः पतनं ज्ञानवर्द्धनम् । वेणुवीणादिवाद्यञ्च कवितारचनादिकम् ॥ रोदनं भाषणं पातः समुत्थानं विजृम्भनम् । गमनं विक्रिया देवि योग इत्यभिधीयते ॥
हे देवि! प्रसन्नता, परमानन्द, ज्ञानवृद्धि, में गिरना, वंशी-वीणादि बजाना, कविता बनाना, रोना, भाषण करना, गिरना, उठना, जंभाई लेना, चलना ये विक्रियायें योग के समान होती हैं।
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